स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी महाराज (लोहारु कांड )

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स्त्रोत :- आर्य समाज हरियाणा का इतिहास

लेखक :- डॉ. रणजीत सिंह

आर्य समाज के क्षितिज पर स्वामी स्वतंत्रतानन्द का उदय हुआ। सामाजिक और सार्वजनिक रुप से स्वामी जी का कार्यक्षेत्र में अवतरण आर्य समाज सिरसा जिला हिसार में हुआ। सिरसा आर्य समाज की स्थापना सन् १८९२ में हो चुकी थी। स्वामी जी सिरसा आर्य समाज के उत्सव पर दर्शक के रुप में गए थे। परंतु उन्हें वक्ता के रुप में व्याख्यान देना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ की सभा में बोलने का संकोच दूर हो गया। जिला करनाल में संभालका में खुलने वाले बूचड़खाने के विरोध में जो आर्य समाजी संगठन खड़ा हुआ था उसमे भक्त फुलसिंह और चौधरी पीरुसिंह के साथ मिलकर गोरक्षा हेतु एक सफल आंदोलन चलाया था।

स्वामी जी समझते थे, यदि हरियाणा एक बार जाग जाए तो आर्य समाज तो आर्य समाज सदा के लिए अमर रह सकेगा। क्योंकि हरियाणा के लोगों की मनोवृत्ति आर्य समाज के अत्यधिक अनुकूल है। हरियाणा जागृति के लिए स्वामी जी ने अनेक बार हरियाणा का भ्रमण किया। चौधरी छोटूराम जी स्वामी जी के भक्त थे, अत: हरियाणा भ्रमण में स्वामी जी को कोई कठिनाई नहीं हुई। आर्य नेता जगदेव सिंह सिद्धांति और आचार्य भगवान देव जी बारी बारी आपके साथ रहे। इस यात्रा के दौरान स्वामी जी जिला रोहतक के ग्राम भापड़ोदा में भी गये, और लोगों से कहा कि आप सेना भर्ती अपने भाइयों से कहें कि वे अपने भाइयों पर गोली न चलावें। यह बात सन् १९४२ के पास की है। अंग्रेज सरकार को जब यह पता चला कि स्वामी जी सेना में विद्रोह कराना चाहते हैं तो उन्हें पकड़ लिया। लाहौर के किले में बंद कर दिये जाने पर भी स्वामी जी का चौधरी छोटूराम से लगाव रहा। महाशय कृष्ण ने इस लगाव को एक लेख में प्रकट करते हुए कहा है कि ” किला के अधिकारी ने स्वामी जी से कहा कि आपके पास बिस्तर नहीं है, बताएं किसके घर से बिस्तर मंगवाएं? इस पर स्वामी जी ने महाशय कृष्ण और दीवान बद्रीदास के नामों के साथ चौधरी छोटूराम का भी नाम लिया।

पांच जनवरी १९४७ को जगदेव सिंह सिद्धांति स्वामी जी से दिल्ली में मिले और पुन: हरियाणा में स्वामी जी के भ्रमण का कार्यक्रम बनाया।

यह यात्रा –

  • राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रसार,
  • मांस और शराब आदि व्यसनों को दूर करने के उद्देश्य से की गई।

इसी यात्रा के मध्य स्वामी जी ने भाषा और लिपि की समस्या पर एक छोटी सी पुस्तक भी लिखी। इसे हरियाणा के नेताओं ने दस हजार की संख्या में छपवाकर वितरित किया। स्वामी जी संयुक्त पंजाब में हरियाणा की उपेक्षा करने की सरकारी नीति के विरोधी थे। अत: वह समझते थे कि सरकार की भाषानीति हरियाणा को और भी पिछड़ा बना देगी।

देशविभाजन के उपरांत रोहतक में दयानंद मठ स्थापित करने के लिए चौधरी माडूसिंह जी और महाशय भरत सिंह आदि महानुभाव स्वामी जी के पास आए। स्वामी जी के आदेश पर १६मार्च १९४८ को स्वामी सोमानंद जी रोहतक गए और वहां लगभग २४ वर्ष कार्य किया। पूज्य स्वामी जी की डायरी से पता चलता है, उन्होने १६ जून १९४९ को दयानंद मठ रोहतक की कार्यकारिणी की एक बैठक की अध्यक्षता थी। लोहारु कांड के आप नायक ही थे। १९४१ ई० में आर्य समाज लोहारु के उत्सव पर स्वामी जी तथा उनके अन्य साथियों पर नवाब ने जानबूझकर आक्रमण करवाया था। इस अवसर पर विशेष रुप से उन सरकारी कर्मचारियों को लोहारु स्थानांतरित कर दिया गया था, जिन्होने १९३५ ई० के लोहारु “जाट आंदोलन ” में ३५ आदमियों को गोलियों का शिकार बना दिया गया। इस आक्रमण में भक्त फुल सिंह और चौधरी न्योनंद सिंह धनखड़ (स्वामी नित्यानंद) भजनोपदेशक बुरी तरह घायल हो गए थे। चौधरी शेर सिंह के पिता चौधरी शिशराम जी स्वामी जी के साथ थे। शीशराम जी ने भाग दौड़ कर गाय का गर्म दूध व हल्दी का प्रबंधन किया। और स्वामी जी को दुध हल्दी पिलाया। राज्य के अधिकारियों के कहने पर स्वामी जी जी के नेतृत्व में जुलूस चला और साथ में ही जमालूद्दीन इंस्पेक्टर के साथ २५ सिपाही भी चले। मंडी से निकलने पर जमालूद्दीन ने जलूस रोका और स्वंय शहर में जाकर थाने के सामने आर्य समाज विरोधियों को इकट्ठा किया। जलूस जब थाने के पास आया तो उसने देखा की इच्छानुसार आगे आदमियों का समूह लाठी, कुल्हाड़ी और भाले लिए खड़ा है। सिपाही बंदूकों की नाल दीवार पर रखकर जलूस की और मुख किये खड़े हैं, कार्यकर्ताओं को परिस्थितियों को देखते ही समझने में देर नहीं लगी। दिन छिप रहा था, इंस्पेक्टर ने कहा स्वामी जी आप ठहरें नमाज का समय है। स्वामी जी ने कहा ठीक है, हमारा भी संध्या का समय है। खड़े होकर सारे जलूस संध्या आरंभ कर दी। संध्या समाप्त होते ही इंस्पेक्टर ने कहा – स्वामी जी आप जलूस को ठाकुरों वाली दूसरी गली में ले जावैं जलूस जब दूसरी गली में मुड़ा तो जमालूद्दीन के इशारे पर भीड़ एकदम जलूस पर टूट पड़ी। वस्तुतः नमाज और संध्या के समय का तो इंस्पेक्टर बहाना बना रहा था। उसकी चाल थी कि अंधेरा और घनेरा हो जाए जिससे जलूस पर आक्रमण करने वाले व्यक्ति गुरिल्ला ढंग से मार भी कर जाएं और पहचाने भी न जाएं। इंस्पेक्टर अपनी नीति में सफल हुआ। आक्रमण का सबसे अधिक जोर स्वामी जी पर था। पहले तो वे प्रत्येक वार को अपने डंडे से रोकते रहे, परंतु जब उनका डंडा टूट गया तो उसके सिर और हाथों पर वार होने लगे। परिणामस्वरूप उनके शरीर पर बहुत अधिक चोटें आई। इनके अतिरिक्त भक्त फुल सिंह चौधरी शीशराम चौधरी गाहड़ सिंह, चौधरी न्योनंद सिंह, और जयप्रकाश धनुर्धर आदि को बहुत सख्त चोटें आई। लोहारु के जिन लोगों पर इस कांड के प्रसंग में अभियोग चलाया गया, उनकी पैरवी का प्रबंध सभा ने किया।

२६ अप्रैल १९४१ को बख्शी रामाकृष्ण एडवोकेट हिसार, ला० सुखदेव जी हिसार और ला० सत्यभूषण जी एडवोकेट डेरागाजीखां लोहारु गए। वे वहां अभियुक्तों और रियासतों के दीवान से भी मिले। ला० सत्यभूषण ने सभा को सूचना दी कि दीवान साहेब अभियुक्तों पर से अभियोग वापिस लेने के लिए तैयार हैं और उन्होने शर्त मान ली हैं। लोहारु कांड मुकदमे के बीच में ही स्वामी कर्मानंद जी का आगमन आर्य समाज लोहारु के लिए वरदान सिद्ध हुआ। स्वामी जी ने लोहारु के आर्यो को उत्साहित किया ओर आर्य समाज लोहारु का फिर से चुनाव किया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद के आदर्शो की पूर्ती के लिए जहां गुरुकुल खोले, वहां आर्य पाठशालाएं स्थापित की गई। परंतु रियासत द्वारा पाठशालाएं खोलने पर पाबंदी थी लेकिन स्वामी कर्मानंद जी ने भुख हड़ताल कर दी। परिणामस्वरूप लोहारु के दीवान ने पाबंदी उठाली। इस प्रकार लोहारु रियासत में आर्य पाठशालाओं का कार्य आरंभ हो गया। समय समय पर जब भी देश धर्म पर आपत्ति आई है आर्य समाज ने उसका डटकर मुकाबला किया है।

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