निराकार ब्रह्म की उपासना कैसे करें?

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लेखक- स्वामी वेदानन्द सरस्वती


इस शंका का समाधान हमें वेदों में ही मिलता है। इसको पढ़िये और मनन कीजिये।


ओ३म् तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रत:।
तेन देवा अजयन्त साध्या ऋषयश्च ये।। -यजु०

अर्थात – (तम्) उस (यज्ञम्) पूजनीय (पुरुषम्) परमेश्वर को जो (अग्रत: जातम्) सृष्टि के पूर्व से ही विराजमान है तथा (ये) जो (देवा:) ज्ञानी (साध्या:) साधक (च) और (ऋषयः) ऋषिजन थे (तेन) उन्होंने (बर्हिषि) मानव ज्ञानयज्ञ में (प्रौक्षन्) सींचकर अर्थात् धारण करके (अजयन्त) उसकी पूजा की।


भावार्थ– ज्ञानी, साधक और ऋषिगण सभी उस परमात्मा का अपने अन्तर-हृदय में ध्यान करते हैं। ज्ञान स्वरूप उस परमात्मा की आज्ञानुसार अपने आचरण को पवित्र बनाते हैं। उस परमात्मा की आज्ञा का पालन करना ही उसकी पूजा है।
वह परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। मानव मात्र के कल्याण के लिए वह अपने ज्ञान का वेदों के रूप में श्रद्धालु भक्तों के हृदय में प्रकाश करता है।


तस्मात् यज्ञात्सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्मादजायत।। -यजु० ३१/७


अर्थात्- उस (सर्वहुत: यज्ञात्) सब का कल्याण करने वाले पूजनीय परमेश्वर से ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की उत्पत्ति होती है। वही ज्ञान, विज्ञान, कर्म और उपासना का प्रकाशक है। ज्ञानहीन, अज्ञानी व्यक्ति न ही सत्कर्म कर सकता है और न उपासना कर सकता है। कर्म और उपासना से पूर्व ज्ञान की उपलब्धि अनिवार्य है। ज्ञान की उपलब्धि ध्यान से और वेदों के स्वाध्याय से ही होती है।


देश-देशान्तरों के लोग गंगा, यमुना, गोदावरी आदि नदियों के उद्गम स्थलों की खोज में निकलते हैं। वे उन जलस्रोतों को देखकर प्रफुल्लित होते हैं। किन्तु ज्ञान गंगा का उद्गम स्थल कहां है ? यह जिज्ञासा विरले लोगों के दिलों में ही पैदा होती है। जब इस विषय पर विचार किया जाता है तो इस ज्ञानगंगा का उद्गम स्थल मस्तिष्क में ही मिलता है। संसार के ज्ञानी हों या अज्ञानी, सभी लोग सोचने-विचारने का काम मस्तिष्क से ही लेते हैं। किन्तु मस्तिष्क तो शरीर में एक मांस का ही पिण्ड है। उसमें ज्ञान कहां से आयेगा? ज्ञान तो चेतन का गुण-धर्म है।
इस शंका का समाधान भी वेदों से ही होता है।

अथर्ववेद का मन्त्र है-


तस्मिन् हिरण्यमये कोषे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते।
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद्वै ब्रह्मविदो विदुः।। -अथर्व० १०/२/३१


अर्थात्– उस हिरण्यमय कोष में जो तीन अरों के ऊपर अवस्थित है उसी में पूजनीय जीवात्मा का निवास है। उसके अस्तित्व का ज्ञान ब्रह्मविद् व्यक्ति को ही होता है। सामान्यजन अपनी आत्मविस्मृति में ही जीवन जीते हैं। यह अज्ञानता ही जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र में डाले रखती है। योगाभ्यास के द्वारा जब जीवात्मा को अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तो वह जन्म-मरण के इस चक्र से बाहर हो जाता है।


ज्ञान चेतन का ही गुण होता है। जड़ पदार्थों में ज्ञान नहीं होता। आत्मा और परमात्मा दोनों चेतन है। दोनों का ही यह ज्ञान गुण है। उनमें भेद केवल यह है कि जीवात्मा एकदेशी है, तो परमात्मा सर्वव्यापक है। जीवात्मा व्याप्य है, तो परमात्मा सर्वव्यापक है। मस्तिष्क की हृदय गुहा में जो जीवात्मा विराजमान है उसमें सर्वज्ञ, सर्वव्यापक परमात्मा का भी आवास है। वहीं से यह ज्ञान गंगा निःसृत हो रही है। जो व्यक्ति जितना एकाग्रचित होकर उस परमात्मा की भक्ति में निमग्न होता है, वह उतना ही अधिकाधिक ज्ञान ज्योति से प्रकाशित हो उठता है। परमात्मा अपने ज्ञान को पहाड़-पत्थरों में यूं ही नहीं फेंक देता। वह उस ज्ञानरूपी अनमोल धन को सत्पात्रों को ही प्रदान करता है। योगनिष्ठ तपस्वी आत्मा ही उस ज्ञान को प्राप्त करती है। ज्ञान सम्पन्न होकर जीवात्मा अपने मन, बुद्धि, शरीर, इन्द्रियों के द्वारा उस ज्ञान को कर्म रूप में अवतरित करता है। उत्तम ज्ञान से उत्तम कर्म निष्पन्न होते हैं। जब ज्ञान और कर्म ये दोनों ही व्यक्ति के पवित्रतम हो जाते हैं, तो व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञमय हो जाता है। ज्ञान ज्योति के प्रकाश में जीवात्मा अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष करता है तथा शरीर, मन, बुध्दि से जो कर्म करता है, वे सब निष्काम भाव से ही पूरे करता है। निष्काम कर्म बन्धन का कारण नहीं होता। याज्ञिक भावना से किये गए निष्काम कर्म ईश्वर की पूजा में समर्पित कर दिए जाते हैं, तो यही ईश्वर उपासना का सर्वोत्तम रूप है।


यजुर्वेद का मन्त्र इसी उपासना पर प्रकाश डाल रहा है-


यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा:।। -यजु० ३१/१६


अर्थात्- (देवा:) ज्ञानी विद्वान् लोग (यज्ञेन्) अपने जीवन यज्ञ से (यज्ञम्) उस पूजनीय यज्ञस्वरूप परमात्मा की (अजयन्त) पूजा करते हैं। उसकी पूजा के (तानि धर्माणि) वे धर्म-कृत्य ही (प्रथमानि) प्रधानतम साधन (आसन्) है। उसी पूजा से (पूर्वे) पूर्वकाल के (साध्या:) साधक लोग और (देवा:) ज्ञानी विद्वान् लोग (यत्र) जहां अमृत सुख भोगते हुए (सन्ति) विराजमान है, वही अपने जीवन को यज्ञमय बनाने वाले धीर पुरुष भी (महिमानः) महानता को प्राप्त करते हुए (ते) वे भी (ह) निश्चय से (नाकम्) मोक्ष के आनन्द को (सचन्त) प्राप्त करते हैं। यज्ञ ही ईश्वर पूजा का श्रेष्ठतम उपाय है।

यह यज्ञ क्या है?

इसको वेद के शब्दों में सुनिए-
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणया श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते।।
एतावद्रूपं यज्ञस्य यद्देवैर्ब्रह्मणा कृतम्।
तदेतत्सर्वमाप्नोति यज्ञे सौत्रामण सुते।। -यजु० १९/३१


भावार्थ– परमात्मा सत्य स्वरूप है। उस सत्य स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करना साधक व्यक्ति का जीवन लक्ष्य होता है। इस जीवन लक्ष्य को पाने के लिए साधक व्यक्ति को चार सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। उनमें प्रथम सीढ़ी है, सत्य की प्राप्ति और अमृत के त्याग का व्रत लेना। ऐसी प्रतिज्ञा करना कि मरूँ चाहे जीऊँ, सत्य को प्राप्त करके ही रहूंगा। यह प्रतिज्ञा ही अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान का पूर्णरूपेण पालन करना, माता-पिता, गुरु, अतिथि, विद्वत्जनों की सेवा-शुश्रूषा यह सब दीक्षा रूप है। इनका पालन करने वाले व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक उन्नति होती है। जन समाज की सेवा का भी वह पात्र बन जाता है। यही उसकी दक्षिणा है। इस दक्षिणा को पाकर उसके मन में सत्य धर्म के प्रति और श्रद्धा बढ़ जाती है। अन्ततः वह श्रद्धा सत्य स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति का साधन बन जाती है। जिस जीवन में व्रत, दीक्षा, दक्षिणा, श्रद्धा और सत्य अवतरित हो जाते हैं, वह जीवन यज्ञमय हो जाता है।

यही जीवन यज्ञ का वास्तविक स्वरूप है। इसी में जीवन की सार्थकता है। यही ईश्वर पूजा का सर्वोत्तम उपाय है। दूसरे सब उपाय व्यक्ति को भटकाने वाले हैं। उत्तम ज्ञान व उत्तम कर्म सब प्रभु चरणों में अर्पित कर देना ही उसकी सेवा है। यह यज्ञरूप प्रभु की जीवनयज्ञ द्वारा पूजा का सर्वोत्तम उपाय है। यही उस निराकार ईश्वरोपासना का वैदिक उपाय है।

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