दयानन्द बावनी
कवि : दुलैराय काराणी
सहिष्णुता
सत्य को प्रकाश न सोहात अन्ध उलूक को।
असत्य-निवास अन्धकार वास जाको है।।
सत्यनिष्ठ स्वामीजी ने केते-केते पाए कष्ट।
ठार मारने को कोई ताड़ने को ताके है।।
बरसायो कीचड़ पत्थर का काहू ने मेह।
उड़े हैं उपान कहीं असि को कड़ाको है।।
ठेर-ठेर सहिष्णुता धारत धरनी समा।
धन्य दयानन्द धन्य तेरी अहिंसा को है।।३५।।
























