राधा स्वामी एक सनातन विरोधी मत। –

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राधा स्वामी एक सनातन विरोधी मत। –

शिव दयाल सिहं सेठ और उनकी पत्नी ने मिलकर राधा स्वामी मत की शुरुआत की थी । शिव दयाल सिंह को उनके चेले स्वामी कहते थे और उनकी पत्नी का नाम था राधा। वही से ये राधा स्वामी शब्द बनाया गया और 15 फरवरी सन 1861 को शिव दयाल सिंह सेठ ने आगरा से राधा स्वामी सत्संग की शुरुआत की। संस्थापक गुरु शिव दयाल सिंह के निधन के 11 साल बाद 1889 में सेना से रिटायर उनके शिष्य जयमल सिंह ने पंजाब में ब्यास नदी के किनारे गुप्त नामदान देना शुरू कर दिया। इस राधास्वामी मत की ब्यास (पंजाब) शाखा के वर्तमान गुरू बाबा गुरिंदर सिंह है।
इस मत की मूल पुस्तक का नाम है “सार बचन” जो महाराज स्वामी शिव दयाल सिंह सेठ ने लिखी है उसमें से हम कुछ बचन यहाँ लिख रहे हैं जिनको पढ़ कर पाठक स्वयं जानेंगे कि यह एक बहुत बड़ा सनातन विरोधी मत है।इस “ सार बचन”पुस्तक में गुरू की महिमा गाने,गुरू की भक्ति करने और सब सनातन विचारधाराओं को छोड़कर गुरू के ही निर्देशों को माने ऐसा लिखा है और गुरू पर अटूट अंधा विश्वास करने के लिए कई बार वर्णन किया गया है जैसे गुरू को घट घट अन्तर्यामी माने, माता पिता सखा बन्धू गुरू को ही माने ,गुरू की ही भक्ति आरती करें और उसकी प्रसन्नता व दया से ही जीवन सफल होगा और मन में जोत जलेगी और गुरू ही सतलोक पहुँचाएगा ,जगत के बंधन गुरू ही काटेगा एक जन्म गुरू भक्ति करो दुसरे जन्म नाम जपें तीसरे जन्म मुक्ति पाओगे और चौथे जन्म निज धाम पाओगे वग़ैरा वग़ैरा ।
सार बचन पुस्तक में जहां गुरू की महिमा भर रखी है वहाँ जगह जगह सनातन धर्म के शास्त्रों और महापुरुषों की निंदा की गई है। इस पुस्तक में लिखा है वेदों गीता रामायण में कोई ज्ञान नहीं है जो सच्चा ज्ञान है केवल गुरू चरणों में मिल सकता है।सार बचन पुस्तक में इस्लाम और ईसाई मत या क़ुरान और बाइबल की कहीं निंदा नहीं मिलेगी बल्कि अच्छाई का वर्णन अवश्य किया गया है।
पुस्तक के कुछ अंश जैसा लिखे है वैसा ही आपकी जानकारी के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि पाठक स्वयं निर्णय लें कि यह मत कितनी सनातन वैदिक धर्म विरोधी है।

१-गुरू है अहम अपार अनामी। गुरू बिन दुसरा और न जानी ।।
नहिं ब्रह्मा नहिं विष्णु महेशा । नहिं ईश्वर परमेश्वर शेषा ॥
राम कृष्ण नहिं दस औतारी।व्यास वशिष्ठ न आदि कुमारी॥
ऋषि मनु देवी न कोई। तीर्थ व्रत धर्म न होई॥ आत्म परमात्म नहिं मानूँ। अक्षर नि:अक्षर नहिं जानूं ॥ बचन ८ पृष्ठ ७२
२-कोई शिव कोई विषणु की। कोई राम कोई कृष्ण की॥ कोई देवी कोई गंगा जमना।कोई मूरत कोई चारों धामा॥ कोई गोकुल कोई बलभाचारी।कोई कंठी माला गल धारी॥कोई अचार कोई संध्या तर्पन।गया गायत्री करें समर्पन॥कोई गीता कोई भागवत पढ़ते। कथा पुरान नेम से सुनते॥क्या दादू क्या नानक पंथी। क्या कबीर क्या पलटू संती॥ सब करते पिछली टेक।वक्त गुरू का खोजा न नेका॥बिन गुरू वक्त भक्ति नाहिं पावे। बिन भक्ति सतलोक न जावे॥बचन ८ पृष्ठ

वेदों की निंदा :-
१-गति अति गोप ( सुक्षम)न जाने वेदा।ज्ञान जोग कर मिले न भेदा॥ पद उनका इनसे रहे दूरी। यह तो थक रहे काल हजूरी॥वह दयाला पद अगम अपारा। तीन सुन्न आगे रहा न्यारा॥ बचन ८ पृष्ठ ७५
२-वेद न जाने भेद. कर्म बस योंही बहिऐ।
यह मार्ग निज संत का। सत्संग से पाईये। बचन ६ पृष्ठ ६५
३- वेद शास्त्र स्मृत और पुराना । पढ़ पढ़ सब पंडित हारा बचन १४ पृष्ठ ११४
४-लोक वेद में जो पड़े, नाग पाँच डँस खायें। बचन ३८ पृष्ठ ३३७
५-काल मत जग में फैला भाई। दयाल मत भेद न काहू पाई ॥
वेद पुराण शास्त्र और सिमृत।इन सब रूघां ( बंद किया ) मारग आई॥
ब्रह्मा विष्णु महादेव शक्ति । दस औतार जाल फैलाई॥ बचन २२ पृष्ठ १८९
६- उस घर वेद नहिं जाने।फिर क्यों कर परमान सुनाया॥बचन २३ पृष्ठ १९८
७- वह अक्षर है वेद को मूला।ज्यों का त्यों ताहि वेद न तोला ॥
वेद कतेब थके दोउ यहँ ही। अक्षर सुन के वार रहाई॥आगे का मर्म न जाना। संतन ने यह करी बखाना॥ बचन११ पृष्ठ १०९
८-यह अजब परम पद पाया। अब तक कोई भेद न गाया॥नहिं वेद कतेब सुनाया।जोगी नहिं ज्ञानी धाया॥ बचन५ पृष्ठ ४७
९- श्रुति सिमृत और वेद पुरान।सबही मारें इनकी जान॥माया काल बिछाया जाल।अपने स्वार्थ करें बेहाल॥बचन२२ पृष्ठ १८६

हिन्दूओं को गाय का गोबर और मूत पीने वाला लिख कर अपमान किया –

जड़ बुद्धी अभिमानी भारी सत्संग बचन न चित ठहराय। गंगा जमुना पाप कटावें। गोबर बछिया मूत पिलाय। पशु होय पशुबन को पूजे। पीपल तुलसी पेड़ लगाये। बचन २२ पृष्ठ १९३

सिख मत के विरूद्ध बचन –
घरी देह मनुष्य की गुरू ने ज्यों त्यों करें कल्याण । सेवा कर पूजा कर उनकी। उन्हीं को गुरू नानक जान। बचन १८ पृष्ठ १४०

इस्लाम से मिलती विचारधारा :-
अंदरूँ अर्श रफ्ता दीदम नूर
कुश्ता शैताँ व हम दमीदम सूर॥बचन -२१ पृष्ठ न० १८०
समीक्षा – मुसलमानों का अल्ला सातवें आसमान पर अर्श पर बैठा है।इस्लाम के अनुसार धर्म से शैतान भटकाता है। उसी तरह राधा स्वामी गुरू लिखते हैं कि अर्श पर पहुँचकर मैंने नूर देखा और शैतान को मारकर सूर को फूंका अर्थात् उस शैतान को मार कर उससे डोर जोड़ी।

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