नगरी नगरी द्वारे द्वारे, ऋषि ने धूम मचाई रे।

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नगरी नगरी द्वारे द्वारे, ऋषि ने धूम मचाई रे।

नगरी नगरी द्वारे द्वारे,
ऋषि ने धूम मचाई रे।
किंचित ना घबराये उनसे,
बाधाएँ आई रे।

गीत गड़रियों के वेदों को,
मूर्ख यहाँ बतलाते थे,
लैला-मजनूँ के किस्से,
कहानियाँ ही गीत गाते थे।
वेदों के विषय में भ्रमता,
जो थी सभी मिटाई रे।।1।।
नगरी नगरी द्वारे द्वारे ऋषि ने…….

निराकार का ध्यान छोड़कर
पूजे थे पाषाणों को,
कुत्तों से भी बदतर,
समझा जाता था इन्सानों को।
मूर्खता और जहालत की,
दीवारें तोड़ गिराई रे।।2।।
नगरी नगरी द्वारे-द्वारे ऋषि ने…….

अनेकों ही अंड बंड पाखण्ड,
यहाँ पर जारी थे
फंसे हुए धूतों के,
चक्कर में नर-नारी थे।
दूर अब अन्धकार किया,
वैदिक ज्योति जलाई रे।।3।।
नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ऋषि ने……

पोपों का गढ़ तोड़ा,
पोल खोली थी
पुराण की धज्जियाँ उड़ाई बाइबिल,
इन्जिलों कुरान की।
मियाँ थे घबराये,
कांपे यहूदी ईसाई रे।।4।।
नगरी नगरी द्वारे द्वारे ऋषि ने……..

विरोधी था संसार जिससे,
जूझा वह अकेला था।
संकट विकट वीरेन्द्र,
मरदानी से झेला था।
प्रबल युक्तियों के द्वारा,
विजय सभी पर पाई रे।।5।।
नगरी नगरी द्वारे द्वारे ऋषि ने…….