महर्षि दयानन्द द्वारा किये गये प्रमुख कार्य –

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महर्षि दयानन्द द्वारा किये गये प्रमुख कार्य –

स्वराज्य व स्वातन्त्र्य का प्रथम उद्घोष सदियों की गुलामी के पश्चात् दासता को ही अपनी नियति मान चुकी भारतीय जनता के बीच महर्षि दयानन्द ने स्वातन्त्र्य अलख जगाई। ब्रिटिश शासन में स्वराज्य जैसे शब्द देशवासियों ने महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों से ही सीखे।

स्वदेशी का आह्वान भारत की जनता को स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग के लिए सबसे प्रथम प्रेरणा देने का कार्य सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द ने ही किया।

क्रान्तिकारियों को प्रेरणा महर्षि दयानन्द के क्रान्तिकारी व्याख्यानों एवं ग्रन्थों से प्रेरणा पाकर हजारों लोग स्वतंत्रता के आन्दोलन में कूद पड़े। इन क्रांतिकारियों के ऐतिहासिक बलिदानों ने पुनः लाखों देशवासियों को प्रेरित किया। भारत ही नहीं नेपाल, मॉरिशस, सूरीनाम जैसे देशों के स्वतंत्रता संग्राम में भी महर्षि दयानन्द के अनुयायियों के बढ़ चढ़ कर भाग लिया।

स्वतंत्रता के लिए विदेश गमन की प्रेरणा महर्षि दयानन्द ने अपने शिष्यों को विदेश जाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए अवसर तलाशने का कार्य सौंपा। इसमें श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम प्रमुख है। आगे चल कर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी इनसे प्रेरणा लेकर विदेशों से सहायता एकत्र कर आजाद हिन्द फ़ौज का गठन किया।

वेदों का पुनरुद्धार जिस समय महर्षि दयानन्द का प्रादुर्भाव हुआ उस समय वेद के गलत अर्थों का प्रचार था। जिसके कारण वेद विरुद्ध मत मतान्तरों का सर्वत्र प्रचार हो गया था। स्वार्थी मनुष्यों ने धर्म के नाम पर भारत की जनता को नाना प्रकार के पाखण्डों व अन्धविश्वासों में फंसा रखा था। ऐसे समय में महर्षि दयानन्द ने वेदों के ईश्वरीय ज्ञान होने की घोषणा की। उन्होंने वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक और सर्वोच्च प्रमाण घोषित किया। वेद विरुद्ध ग्रंथों को अप्रमाणिक घोषित किया।

शास्त्रार्थ परम्परा का पुनरुज्जीवन असत्य को पराजित कर सत्य की स्थापना करना ही महर्षि दयानन्द का सर्वोच्च ध्येय रहा। इसके लिए उन्होंने विभिन्न मत-मतान्तरों के विद्वानों को ललकारा और अनेक शास्त्रार्थ किये।

देशभर में वेद प्रचार अपने सन्यासी धर्म का पालन करते हुए महर्षि दयानन्द कभी भी एक स्थान पर अधिक दिन नहीं टिकते थे और पूरे देश में घूम घूम कर सत्य सनातन वैदिक धर्म का प्रचार करते थे।

संस्कृत वांग्मय का प्रचार वेदों को शिरोमणि मानते हुए महर्षि दयानन्द ने महर्षि ब्रह्मा से महर्षि जैमिनि पर्यन्त ऋषि-मुनियों द्वारा रचित आर्ष ग्रंथों को परतः प्रमाण के रूप में स्वीकार किया। इसमें चारों वेदों के ब्राह्मण ग्रन्थ, छह अंग, छह उपांग, चार उपवेद, ग्यारह उपनिषद, स्मृतियाँ सूची आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं।

राजपुरुषों को प्रेरणा यद्यपि 1857 के असफल स्वत्रन्त्रता संग्राम के पश्चात् भारतीय रियासतों में सीमित अधिकारों के साथ ही राजा-महाराजा थे। परन्तु फिर भी उनका अपनी स्थानीय प्रजा में विशेष आदर बरकरार था। यह देखते हुए महर्षि दयानन्द ने राजपुरुषों को प्रेरणा देने का कार्य प्रारम्भ किया और अनेक राजा, महाराजा व राज कर्मचारी उनके शिष्य बने।

एकेश्वरवाद की पुनर्स्थापना भारत में प्रचलित भिन्न भिन्न मत मतान्तरों ने अपने अपने सम्प्रदायों के इष्ट देव बना लिए थे और प्रत्येक सम्प्रदाय अपने इष्ट देवों को सर्वोच्च और अन्य सम्प्रदायों के देवों को तुच्छ बताते थे। इससे एक तो जनता सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सही स्वरूप से विमुख हो गई और दुसरे सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य रहता था। महर्षि दयानन्द ने एक ही वेदोक्त ईश्वर के होने घोषणा की।

आर्यसमाज की स्थापना महर्षि दयानन्द ने 10 अप्रैल 1875 के दिन बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज हिन्दूओं का प्रथम संगठन बना। उनके निर्वाण तक लगभग 79 नगरों में आर्य समाज मन्दिरों की स्थापना हो चुकी थी। वर्तमान में आर्य समाज का विस्तार लगभग 42 देशों में हो चुका है और 10000 से अधिक आर्य समाज मन्दिर स्थापित हो चुके हैं।

हिन्दी भाषा की पुनर्स्थापना जिस समय सर्वसाधारण के बीच आक्रान्ताओं की भाषा फारसी, उर्दू एवं अंग्रेजी का बोल बाला था। संस्कृत को केवल कर्मकाण्ड की भाषा माना जाता था और हिन्दी मृतप्राय हो चुकी थी। ऐसे समय में महर्षि दयानन्द ने घोषणा की कि हिन्दी भाषा ही भारत को एक सूत्र में पिरो सकती है। मातृभाषा गुजराती और संस्कृत के विद्वान होते हुए भी उन्होंने अपने व्याख्यानों व ग्रंथों की भाषा हिंदी कर दी।

वेदों का भाष्य महर्षि दयानन्द ने आम जनता को वेदों का ज्ञान सुलभ कराने के लिए संस्कृत व हिन्दी भाषा में वेदों का भाष्य (अनुवाद) करना प्रारम्भ किया। वेद भाष्य करने से पूर्व उन्होंने ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ में वेद विषयक अपने मन्तव्यों एवं पद्धति का निरूपण किया। अपने जीवन काल में उन्होंने यजुर्वेद के भाष्य का कार्य पूर्ण कर दिया था। इसके पश्चात् उन्होंने ऋग्वेद का भाष्य प्रारम्भ किया परन्तु उसके पूर्ण होने से पहले ही उनका निर्वाण हो गया।

वैदिक यन्त्रालय की स्थापना जिस समय स्वामी दयानन्द ने वेदभाष्य तथा अन्य ग्रन्थों का लेखन एवं प्रकाशन कार्य द्रुतगति से प्रारम्भ किया तभी से स्वामी जी अपना प्रकाशन संस्थान खोलने की आवश्यकता अनुभव करने लगे। अन्ततः माघ शुक्ला 2, सं. 1936 वि. गुरुवार अर्थात 12 फरवरी 1880 ई. को काशी के लक्ष्मीकुण्ड स्थित महाराज विजयनगराधिपति के स्थान पर वैदिक यन्त्रालय की स्थापना हुई। प्रारम्भ में इसका नाम ‘प्रकाश यन्त्रालय’ रखा गया था, बाद में वैदिक यन्त्रालय कर दिया गया। आगे चलकर इसको अजमेर स्थानान्तरित कर दिया गया।

क्रान्तिकारी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश की रचना सनातन वैदिक धर्म के सत्य स्वरुप को प्रस्तुत करने के लिए महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ की रचना की। यह उनकी सर्वोत्तम कृति मानी जाती है। इस ग्रन्थ में उन्होंने तत्कालीन प्रचलित मत-मतान्तरों की निष्पक्ष समीक्षा भी की है। सत्यार्थ प्रकाश संस्कृतनिष्ठ मानक हिन्दी का पहला ग्रन्थ है।

अन्य ग्रन्थों की रचना महर्षि दयानन्द ने पाखण्ड के खण्डन व धर्म के मण्डन के उद्देश्य से अनेक ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त शिक्षा हेतु ग्रन्थों की रचना भी की।

विज्ञान क्षेत्र महर्षि दयानन्द ने वेदों के विज्ञान का पर्याय होने की घोषणा की। उन्होंने विकासवाद का सर्वप्रथम खण्डन किया और सृष्टि उत्पत्ति की वैदिक प्रक्रिया को सिद्ध किया। उन्होंने अपने ग्रन्थों में विमानों, अन्तरिक्ष यानों, अनेक सौर मंडलों, परग्रहियों, अणु-परमाणुओं, सगोत्र विवाह निषेध आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने शारीरिक तंत्र को समझने के लिए एक मानव शव का परीक्षण भी किया।

गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति की पुनर्स्थापना महर्षि दयानन्द ने गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति को पुनः स्थापित किया। उन्होंने फर्रुखाबाद के टोकाघाट पर प्रथम संस्कृत एवं वेद पाठशाला की स्थापना की।

गौरक्षा हेतु अभियान गौमाता की रक्षा तभी संभव थी जब उसको अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बना दिया जाये। इसी सोच के साथ उन्होंने गौ आधारित कृषि एवं आर्थिकी का प्रचार किया। साथ ही लाचार व बूढ़ी गौवंश के लिए उन्होंने रेवाड़ी में भारत की पहली गौशाला की स्थापना की।

आर्य आक्रमण सिद्धान्त का प्रथम खण्डन आक्रान्ता ईसाईयों (अंग्रेजों) ने अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति के मूलाधार आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी बताने का षड्यन्त्र किया। इसका उद्देश्य भारतीयों को आर्य द्रविड़ के नाम पर बाँटना भी था। महर्षि दयानन्द ने सर्वप्रथम इसका पुरजोर खण्डन किया।

प्रथम हिन्दू अनाथालय की स्थापना उस काल में अनाथ हिन्दू बच्चों के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती थी और उनको ईसाई अनाथालयों के हवाले कर दिया जाता था। महर्षि दयानन्द ने इस उलटी व्यवस्था को देखा और पंजाब के फिरोजपुर में प्रथम हिन्दू अनाथालय की स्थापना की।

घर वापसी (शुद्धि) स्वधर्मियों व विधर्मियों के अत्याचारों से डर कर अथवा लोभ-लालचवश स्वधर्म त्यागने वाले लोगों की घर वापसी का कोई रास्ता नहीं था। ऐसे लोगों को उनके पूर्वजों के धर्म में वापस लाने के लिए महर्षि दयानन्द ने शुद्धि का द्वार खोला।

उत्तराधिकारिणी सभा की स्थापना महर्षि दयानन्द ने परोपकारिणी सभा की प्रथम स्थापना मेरठ में की। तदर्थ 16 अगस्त 1880 ई. को एक स्वीकार पत्र लिखा तथा उसी दिन मेरठ के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में उसे पंजीकृत कराया गया। इस सभा को अपने वस्त्र, धन, पुस्तक एवं यन्त्रालय आदि के स्वत्व प्रदान किये थे। कालान्तर में जब स्वामी जी 1883 ई. के आरम्भ में उदयपुर पधारे तो उन्होंने एक अन्य स्वीकार पत्र लिखकर परोपकारिणी सभा का न केवल पुनर्गठन ही किया अपितु उसे उदयपुर राज्य की सर्वोच्च प्रशासिका महद्राज सभा के द्वारा फाल्गुन कृष्णा पञ्चमी 1829 वि. (27 फरवरी 1883 ई.) को पञ्जीकृत भी करवाया।

सत्य के लिए बलिदान महर्षि दयानन्द सत्य के लिए जिये और सत्य के लिए ही बलिदान हो गये। बीस वर्ष के कार्यकाल में उनके विरोधियों ने लगभग 44 बार उनके प्राण हरण की चेष्टाएँ कीं। परन्तु वे हर बार अपने ब्रह्मचर्य बल एवं यौगिक बल से बच जाते थे। परन्तु 44वां प्रयास प्राणघातक सिद्ध हुआ और उन्होंने शान्त चित्त से प्रभु स्मरण करते हुए प्राण त्याग दिया। उनकी मृत्यु का दृश्य देखकर एक नास्तिक युवक गुरुदत्त आस्तिक बन गया।

साभार – आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली

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