हुआ ध्यान में ईश्वर के जो मगन
हुआ ध्यान में ईश्वर के जो मगन,
उसे कोई क्लेश लगा न रहा।
जब ज्ञान की गंगा में नहाया,
तो मन में मैल जरा न रहा।।१।।
परमात्मा को जब आत्मा ने,
लिया देख ज्ञान की आंखों से।
प्रकाश हुआ मन में उसके,
कोई उससे भेद छिपा न रहा।।२।।
पुरूषार्थ ही इस दुनियां में,
सब कामना पूरी करता है।
मन चाहा फल उसने पाया,
जो आलसी बनके पड़ा न रहा।।३।।
दुःखदायी है सब शत्रु हैं,
ये विषय है जितने दुनियां के।
वही पार हुआ भवसागर से,
जो जाल में इनके फंसा न रहा।।४।।
यहां वेद विरुद्ध जब मत फैले,
पत्थर की पूजा जारी हुई।
जब वेद की विद्या लुप्त हुई,
फिर ज्ञान का पांव जमा न रहा।।५।।
यहां बड़े-बड़े महाराज हुए,
बलवान हुए विद्वान हुए।
पर मौत के पंजे से “केवल”
कोई दुनियां में आके बचा न रहा।।६ ।।










