शहीद भगत सिंह क्यों आदर्श है?

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भगत सिंह

शहीद भगत सिंह क्यों आदर्श है?

‘मैं नास्तिक क्यों हूँ? शहीद भगतसिंह की यह छोटी सी पुस्तक वामपंथी, साम्यवादी लाबी द्वारा आजकल नौजवानों में खासी प्रचारित की जा रही है, जिसका उद्देश्य उन्हें भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु उनमें नास्तिकता को बढ़ावा देना है। कुछ लोग इसे कन्धा भगत सिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं। मेरा एक प्रश्न उनसे यह है की क्या भगत सिंह इसलिए हमारे आदर्श होने चाहिए कि वे नास्तिक थे, अथवा इसलिए कि वे एक प्रखर देशभक्त और अपने सिद्धान्तों से किसी भी कीमत पर समझौता न करने वाले बलिदानी थे? सभी कहेंगे कि इसलिए कि वे देशभक्त थे। भगतसिंह के जो प्रत्यक्ष योगदान है उसके कारण भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका कद इतना उच्च है कि उन पर अन्य कोई संदिग्ध विचार धारा थोपना कतई आवश्यक नहीं है। इस प्रकार के छद्म प्रोपगंडा से भावुक एवं अपरिपक्व नौजवानों को भगतसिंह के समग्र व्यक्तित्व से अनभिज्ञ रखकर अपने राजनीतिक उद्देश्य तो पूरे किये जा सकते हैं, भगतसिंह के आदर्शों का समाज नहीं बनाया जा सकता। किसी भी क्रांतिकारी की देशभक्ति के अलावा उनकी अध्यात्मिक विचारधारा अगर हमारे लिए आदर्श है तब तो भगत सिंह के अग्रज महान् कवि एवं लेखक, भगत सिंह जैसे अनेक युवाओं के मार्ग द्रष्टा, जिनके जीवन में क्रांति का सूत्रपात स्वामी दयानंद द्वारा रचित अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को पढने से हुआ था, कट्टर आर्यसमाजी, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जिनका सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य पालन से होने वाले लाभ का साक्षात् प्रमाण था, क्यों हमारे लिए आदर्श और वरण करने योग्य नहीं हो सकते?

क्रान्तिकारी सुखदेव थापर वेदों से अत्यंत प्रभावित एवं आस्तिक थे एवं संयम विज्ञान में उनकी आस्था थी। स्वयं भगत सिंह ने अपने पत्रों में उनकी इस भावना का वर्णन किया है। हमारे लिए आदर्श क्यों नहीं हो सकते?’आर्यसमाज मेरी माता के समान है और वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य है। ऐसा उद्घोष करने वाले लाला लाजपतराय जिन्होंने जमीनी स्तर पर किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने से लेकर उच्च बौद्धिक वर्ग तक में प्रखरता के साथ देशभक्ति की अलख जगाई और साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे क्यों हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते? क्या इसलिए कि वे आस्तिक थे? वस्तुतः: देशभक्त लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखने के लिए यह एक पर्याप्त आधार है कि वे सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने देश की भलाई के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और सपनों सहित अपने जीवन का बलिदान कर दिया, इससे उनके सम्मान में कोई कमी या वृद्धि नहीं होती कि उनकी आध्यात्मिक विचारधारा क्या थी। रामप्रसाद के बलिदान का सम्मान करने के साथ अशफाक के बलिदान का केवल इस आधार पर अवमूल्यन करना कि वे इस्लाम से सम्बंधित थे, केवल मूर्खता ही कही जाएगी।

ऐसे हजारों क्रांतिकारियों का विवरण दिया जा सकता है जिन्होंने न केवल मातृभूमि की सेवा में अपने प्राण न्योछावर किये थे अपितु मान्यता से वे सब दृढ़ रूप से आस्तिक भी थे। क्या उनकी बलिदान और भगत सिंह के बलिदान में कुछ अंतर हैं? नहीं। फिर यह अन्याय नहीं तो और क्या है?अब यह भी विचार कर लेना चाहिए कि भगत सिंह की नास्तिकता क्या वाकई में नास्तिकता है? भगत सिंह शहादत के समय एक 23 वर्ष के युवक ही थे। उस काल में 1920 के दशक में भारत के ऊपर दो प्रकार की विपत्तियाँ थीं। 1921 में परवान चढ़े खिलाफत के मुद्दे को कमाल पाशा द्वारा समाप्त किये जाने पर कांग्रेस एवं मुस्लिम संगठनों की हिन्दू-मुस्लिम एकता ताश के पत्तों के समान उड़ गई और सम्पूर्ण भारत में दंगों का जोर आरंभ हो गया। हिन्दू मुस्लिम के इस संघर्ष को भगत सिंह द्वारा आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी अड़चन के रूप में महसूस किया गया, जबकि इन दंगों के पीछे अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति थी। इस विचार मंथन का परिणाम यह निकला कि भगत सिंह को “धर्म” नामक शब्द से घृणा हो गई। उन्होंने सोचा कि दंगों का मुख्य कारण धर्म है। उनकी इस मान्यता को दिशा देने में मार्क्सवादी साहित्य का भी योगदान था, जिसका उस काल में वे अध्ययन कर रहे थे। दरअसल धर्म दंगों का कारण ही नहीं था, दंगों का कारण मत-मतान्तर की संकीर्ण सोच थी। धर्म पुरुषार्थ रूपी श्रेष्ठ कार्य करने का नाम है, जो सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। जबकि मत या मज़हब एक सीमित विचारधारा को मानने के समान हैं, जो न केवल अल्पकालिक हैं अपितु पूर्वाग्रह से युक्त भी हैं। उसमें उसके प्रवर्तक का सन्देश अंतिम सत्य होता है। मार्क्सवादी साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका धर्म और मज़हब शब्द में अंतर न कर पाना है।

उस काल में अंग्रेजों की विनाशकारी नीतियों के कारण भारत देश में गरीबी अपनी चरम सीमा पर थी और अकाल, बाढ़, भूकंप, प्लेग आदि के प्रकोप के समय उचित व्यवस्था न कर पाने के कारण थोड़ी सी समस्या भी विकराल रूप धारण कर लेती थी। ऐसे में चारों ओर गरीबी, भुखमरी, बीमारियाँ आदि देखकर एक देशभक्त युवा का निर्मल ह्रदय का व्यथित हो जाना स्वाभाविक है। परन्तु इस प्रकोप का श्रेय अंग्रेजी राज्य, आपसी फूट, शिक्षा एवं रोजगार का अभाव, अन्धविश्वास आदि को न देकर ईश्वर को देना कठिन विषय में अंतिम परिणाम तक पहुँचने से पहले की शीघ्रता के समान है। दुर्भाग्य से भगत सिंह जी को केवल 23 वर्ष की आयु में देश पर अपने प्राण न्योछावर करने पड़े, वरना कुछ और काल में विचारों में प्रगति होने पर उनका ऐसा मानना कि संसार में दुखों का होना इस बात को सिद्ध करता है कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं हैं, वे स्वयं ही अस्वीकृत कर देते।

संसार में दुःख का कारण ईश्वर नहीं अपितु मनुष्य स्वयं हैं। ईश्वर ने तो मनुष्य के निर्माण के साथ ही उसे वेद रूपी उपदेश में यह बता दिया कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है? अर्थात् मनुष्य को सत्य-असत्य का बोध करवा दिया था। अब यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वो सत्य मार्ग का वरण करे और असत्य मार्ग का त्याग करे। पर यदि मनुष्य अपनी अज्ञानता से असत्य मार्ग का वरण करता है तो आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक तीनों प्रकार के दुखों का भागी बनता है। अपने सामर्थ्य के अनुसार कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है- यह निश्चित सिद्धांत है मगर उसके कर्मों का यथायोग्य फल मिलना भी उसी प्रकार से निश्चित सिद्धांत है। जिस प्रकार से एक छात्र परीक्षा में अत्यंत परिश्रम करता है उसका फल अच्छे अंकों से पास होना निश्चित है, उसी प्रकार से दूसरा छात्र परिश्रम न करने के कारण फेल होता हैं तो उसका दोष ईश्वर का हुआ अथवा उसका हुआ। ऐसी व्यवस्था संसार के किस कर्म को करने में नहीं हैं? सकल कर्मों में हैं और यही ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था है। फिर किसी भी प्रकार के दुःख का श्रेय ईश्वर को देना और उसके पीछे ईश्वर की सत्ता को नकारना निश्चित रूप से गलत फैसला है। भगत सिंह की नास्तिकता वह नास्तिकता नहीं है जिसे आज के वामपंथी गाते हैं। यह एक 23 वर्ष के जोशीले, देशभक्त नौजवान युवक की क्षणिक प्रतिक्रिया मात्र है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश है। भगतसिंह की जीवन शैली, उनकी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सबसे बढकर उनके जीवन-शैली से सिद्ध होता है कि किसी भी आस्तिक से आस्तिकता में कमतर नहीं थे। वे परोपकार रूपी धर्म से कभी अलग नहीं हुए, चाहे उन्हें इसके लिए कितनी भी हानि उठानी पड़ी। महर्षि दयानन्द ने इस परोपकार रूपी ईश्वराज्ञा का पालन करना ही धर्म माना है और साथ ही यह भी कहा है कि इस मनुष्य रूपी धर्म से प्राणों का संकट आ जाने पर भी पृथक न होवे। भगतसिंह का पूरा जीवन इसी धर्म के पालन का ज्वलंत उदाहरण है। इसलिए उनकी आस्तिकता का स्तर किसी भी तरह से कम नहीं आंका जा सकता।

मेरा इस विषय को यहाँ उठाने का मंतव्य यह स्पष्ट करना है कि भारत माँ के चरणों में आहुति देने वाला हर क्रांतिकारी हमारे लिए महान और आदर्श है। उनकी वीरता और देश सेवा हमारे लिए वरणीय है। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा और देशभक्ति का श्रेय नास्तिकता को नहीं अपितु उनके पूर्वजों द्वारा माँ के दूध में पिलाई गयी देश भक्ति कि लोरियां हैं, जिनका श्रेय स्वामी दयानंद, करतार सिंह सराभा, भाई परमानन्द, लाला लाजपत राय, प्रोफेसर जयदेव विद्यालंकार, भगत सिंह के दादा आर्यसमाजी सरदार अर्जुन सिंह और उनके परिवार के अन्य सदस्य, सिख गुरुओं की बलिदान की गाथाओं को जाता है, जिनसे प्रेरणा की घुट्टी उन्हें बचपन से मिली थी और जो निश्चित रूप से आस्तिक थे। भगत सिंह की महानता को नास्तिकता के तराजू में तोलना साम्यवादी लेखकों द्वारा शहीद भगत सिंह के साथ अन्याय के समान है। वैसे साम्यवादी लेखकों कि दोगली मानसिकता के दर्शन हमें तब भी होते हैं जब वे भगत सिंह द्वारा गोरक्षा के लिए हुए कुका आंदोलन एवं वंदे मातरम के आज़ादी के उद्घोष के समर्थन में उनके द्वारा लिखे हुए साहित्य कि अनदेखी इसलिए करते हैं क्यूंकि यह उनकी पार्टी के एजेंडे के विरुद्ध जाता हैं। प्रबुद्ध पाठक स्वयं इस आशय को समझ सकते हैं।

#डॉ_विवेक_आर्य

*क्या भगत सिंह नास्तिक थे?*

(२३ मार्च शहीद दिवस पर विशेष)*-

आचार्य राहुलदेवः*

सरदार भगत सिंह के गांव में उनकी स्मृति में बने संग्रहालय को देखने से भगत सिंह के जीवन, व्यक्तित्व, उनकी विचारधारा, उनके गुरु का पता लगता है।

उनके संग्रहालय की दीवारों पर लगे अखबारों में महाशय राजपाल की हत्या की खबरें प्रकाशित है, महाशय राजपाल की अंतिम संस्कार की खबर वाला अखबार भी वहाँ लगा हुआ है।

वह भक्तिदर्पण पुस्तक भी रखी हुई है, जिसे महाशय राजपाल जी ने छापा था और भगत सिंह जिसे पढकर संध्या और योग करते थे।

भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह जी का हवनकुंड भी वहाँ पर रखा हुआ है।

भगत सिंह को अरेस्ट करने की खबरे उस समय के अखबारों में छपी पडी है। भगत सिंह का अस्थिकलश भी वहाँ पर रखा हुआ है।

अब आप लोग विचार करें। इन उपरोक्त संग्रहालयों के साक्ष्य से लगता है कि भगत सिंह नास्तिक थे? क्योंकि वहां पर रखी हुई एक-एक वस्तु अभी भी जीवन्त होकर भगत सिंह के आस्तिक, भारतीय संस्कृति सभ्यता से ओत प्रोत, सच्चे देशभक्त होने का पता बता रही हैं।

जो आर्यसमाज से पूर्ण रुप से प्रभावित है, जो न केवल महर्षि दयानन्द के शिष्यों से प्रभावित है अपितु जिसके दादाजी सरदार अर्जुन सिंह स्वयं दयानन्द के शिष्य थे। जिन्होंने महर्षि दयानन्द से यज्ञोपवीत कराया था। वहाँ पर रखा हुआ हवन कुण्ड ये बता रहा है कि उस हवन कुण्ड में भगत सिंह की आहुतियाँ पडी हैं।

तभी तो संग्रहालय की डाक्यूमेंटरी में स्वामी दयानन्द को उनका गुरु बताया गया है। यानी भगत सिंह आर्य समाजी थे, वहाँ संग्रहालय में घूमने जाने वाले अधिकतर लोगों को वहीं जाकर ये पता लगता है कि भगत सिंह तो आर्यसमाजी था।

अधिकतर लोग जो उन्हें नास्तिक सिद्ध करते हैं वे उनके अन्तीम समय के पत्र एवं लेख का उद्धरण देते हैं। मैंने भी उनका लेख और उनका चिन्तन पढा है जो उन्हें नास्तिक होने का दावा करता है। परंतु उनके स्कूल की कापियां देखीं, जिन पर ओम लिखा हुआ था, उनके पत्र देखे, जिनमें ओम लिखा था, उर्दू सत्यार्थ प्रकाश देखा, जिसे उनके दादा जी पढते थे। सावरकर जी की 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक देखी। जिसे भगत सिंह ने छपवाया था। तो क्या वे आर्य समाजी नहीं थे? ओम लिखने वाला नास्तिक हो सकता है?

दूसरा और एक कारण है जिससे भगत सिंह के नास्तिक होने का भ्रम अधिकतर लोगों में फैल गया वह कारण था आर्य समाजी होना क्योंकि आज भी जो आर्यसमाज को ठीक-ठीक नहीं जानते हैं ना ही सिद्धांतों का पता है उनके मन में आर्यसमाज का मतलब होता है नास्तिक, अर्थात जो देवी देवताओं को नहीं मानते। जो भगवान को नहीं मानते। आज भी बृहत्तर हिंदू समाज जो सनातनी कहा जाता है। वह एक “आर्यसमाजी” को “नास्तिक” ही कहते हैं। क्योंकि आर्यसमाजी मूर्ति पूजा नहीं करते। वे एक निराकार ईश्वर को प्राणायाम, योग साधना के द्वारा उसकी सन्ध्या, उपासना, जप, ध्यान करते हैं। उस ईश्वर को जानने का उपाय करते हैं। क्योंकि इस सृष्टि का रचना करने वाला, एकमात्र ईश्वर ही है। जो निराकार है, जो सृष्टि की रचना करने वाला, पालन करने वाला, सहार करने वाला, जीवो को उसके कर्मानुसार फल देने वाला और वेद ज्ञान को देने वाला है।

आर्यसमाज इस प्रकार ईश्वर और वेद को मानता है, वह मूर्तिपूजा को नहीं मानता। इससे भी भगत सिंह के नास्तिक होने संबंधित विषय को बल मिलता है क्योंकि भगत सिंह आर्य समाजी होने से सामान्य सनातनी जो पूजा करते हैं वे स्वाभाविक रूप से इससे दूर थे परंतु वास्तव में जैसे एक आर्य समाजी कभी भी नास्तिक नहीं होता, वह परम ईश्वर भक्त होता है। ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जानता है। वह शुद्ध शाकाहारी होता है। आस्तिक होता है। वह देशभक्त होता है। वह जागरूक होता है। वह कभी पाखंड और अंधविश्वास में नहीं पड़ता। वह कभी किसी की ठगी का शिकार नहीं होता। वह देश पर मर मिटने के लिए सदा तैयार रहता है। यही साक्षात गुण या अधिकतर गुण भगत सिंह में दिखाई देते थे। इसलिये वे पक्के आर्यसमाजी थे। जैसे आर्यसमाजी को सामान्य तौर पर नास्तिक कह दिया जाता है इसलिए शायद उन्हें भी नास्तिक कहा जाने लगा। परंतु उक्त प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि भगत सिंह नास्तिक नहीं थे। परंतु आर्य समाजी होने का मतलब यह नहीं कि भगत सिंह किसी मजहब या किसी जाति विशेष या प्रांत विशेष के ही थे। क्योंकि आर्यसमाज कोई मजहब या मत संप्रदाय नहीं है। आर्यसमाज वैदिक सिद्धांत वैदिक साहित्य जो वेदों पर आधारित है उस प्राचीन परंपरा को मानने वाला एक क्रांतिकारी संगठन है। आपको यह फता होना चाहिये कि देश को स्वतंत्रता दिलाने में आर्यसमाज अग्रणी रहा। आर्यसमाज, सत्यार्थ प्रकाश और स्वामी दयानन्द से प्रेरित अधिकतर क्रांतिकारी हुए जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और 1947 में देश को स्वतंत्र कराया।

कांग्रेस के इतिहास लेखक पट्टाभि सीतारमैया लिखते हैं कि जब अंग्रेजों ने 1947 से पहले जब एक सर्वे कराया था कि जेलों के अंदर में जो लोग बंद है वह किस विचारधारा से प्रेरित है उनको देशभक्ति की प्रेरणा कहाँ से मिलती है तब उस सर्वे में पाया गया था कि जेल के अंदर में बंद और जो स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग ले रहे हैं उनमें 85% लोग आर्यसमाज की विचारधारा को मानने वाले हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह नास्तिक नहीं थे अपितु एक देशभक्त, सच्चे भारतीय और आर्य समाज की विचारधारा से ओतप्रोत थे।

तीसरी बात उन्होंने एक निबन्ध “मैं नास्तिक क्यो हूँ” जो जैल में लिखा था। जिसका प्रकाशन “द पीपल” पत्रिका जो लाहौर से निकलती थी सितम्बर १९३१ ई में हुआ था। भगत सिंह ने अपने कारावास जीवन में चार डायरीयाँ लिखी थी जो अभी अप्राप्त है किन्तु यह निबन्ध उनके पिताजी जब उनसे जैल में मिलने गये थे तो अपने साथ ले आये थे। शहीद भगत सिंह की यह छोटी सी पुस्तक वामपंथी, साम्यवादी लाबी द्वारा आजकल नौजवानों में काफी फैलाई जा रही है, जिनका उद्देश्य उन्हें भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु उनमें नास्तिकता के भाव भरना है। मेरा एक प्रश्न उनसे यह है की क्या भगत सिंह इसलिए हमारे आदर्श होने चाहिए कि वे नास्तिक थे, अथवा इसलिए कि वे एक सच्चे देशभक्त और अपने सिद्धान्तों से किसी भी कीमत पर समझौता न करने वाले बलिदानी थे? सभी कहेंगे कि इसलिए कि वे देशभक्त थे। तो हम उन्हें नास्तिकता के कारण महान क्यों बतायें? भगतसिंह के जो प्रत्यक्ष योगदान है उसके कारण भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका कद इतना ऊँचा है कि उन पर अन्य कोई संदिग्ध विचार धारा थोपना कतई आवश्यक नहीं है। इस प्रकार के छद्म प्रोपगंडा से भावुक एवं अपरिपक्व नौजवानों को भगतसिंह के समग्र व्यक्तित्व से अनभिज्ञ रखकर अपने राजनीतिक उद्देश्य तो पूरे किये जा सकते हैं, परन्तु भगतसिंह के आदर्शों का समाज नहीं बनाया जा सकता। मुझे लगता है अवस्था के अनुसार यह एक प्रकार का क्षोभ है। क्योंकि बाल्यकाल में जैसा कि उन्होंने अपने “मैं नास्तिक हूँ” वाले निबन्ध में अपने बाबा अर्जुन सिंह के आर्यसमाजी होने का जिक्र किया है। बचपन में कई घंटे तक गायत्री मन्त्र के जपने का भी जिक्र किया है। तो निश्चित रुप से देश भक्ति का जज्बा तो बाबा और पिता के संस्कारों से प्राप्त हुआ है, ना कि नास्तिकता के संस्कारों से, जैसे कोई व्यक्ति जब बहुत परिश्रम करता है और तब भी लोग उसे समझने का प्रयास नहीं करते, तब वह व्यक्ति कहता है, मेरा इतनी योग्यता बनाने और पढ़ने का क्या लाभ हुआ? इससे अच्छा तो मैं अनपढ होता। इसका मतलब यह नही है कि वह अनपढ ही है, व्यक्ति क्षोभ प्रकट करता है। जैसे कोई व्यक्ति संसार में अधिक दुख और पाप को देखकर यह कहे की ईश्वर तो पापियों को दंड देते हैं पर ऐसा तो संसार में दिखाई नहीं पड रहा। इसलिए ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानता। पर कई बार जब दुख अधिक आ जाते हैं तो व्यक्ति क्षोभ के कारण ऐसा बोलता है। भगत सिंह के अंतिम समय के क्षण भी कुछ ऐसे ही थे जो वह युवावस्था के जोश और क्षोभ के कारण देशवासियों को जगाने के लिए मानो क्षोभ प्रकट कर रहे थे। सामंतवादी और पूंजीवाद के विरुद्ध भी उन्होंने बहुत सारी बातें लिखी हैं वे समानता लाना चाहते थे, गरीबी हटाना चाहते थे, समान शिक्षा रहन सहन की वकालत करते थे कुछ बातें कॉल मार्क्स की विचारधारा से मिली जुली लग सकती है। परंतु समानता का उपदेश, गरीब पिछड़े, असहायओं की सहायता, समान शिक्षा, सर्व शिक्षा, समान व्यवस्थाएं, ऊंचनीच का भेद मिटाना आदि यह तो पहले ही वैदिक समाजवाद में उत्तरोत्तर है यहाँ सर्वे भवन्तु सुखीनः है। वसुधैव कुटुम्बकं है। संगच्छध्वं संवदध्वं है। यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानु पश्यति है। फिर नास्तिको से कौन सी शिक्षा लेनी थी? कुछ भी नहीं। इससे भी भगत सिंह को नास्तिक नहीं सिद्ध किया जा सकता। क्योंकि वे पूर्णाकालिक या जन्मना नास्तिक नहीं थे यदि १९३१ में वे शहीद नहीं होते वे जीवित रहते तो धीरे-धीरे उनमें परिपक्वता आती और वे बदल भी जाते। क्योंकि युवावस्था वह भी मात्र २३ वर्ष के युवक के विचार तो ज्वार भांठा की तरह होते हैं कभी ऊग्र तो कभी शांत, हमारे साथ भी ऐसा बाल्यकाल में युवावस्था कॉलेज की पढ़ाई करते समय अनेक बार विचारों में बहुत बड़ा उथल पुथल हुआ है और अनेकों के साथ ऐसा होता है जो पहले 5 साल पहले कुछ सोचते थे फिर दो साल में ही उसकी बहुत विपरीत बदले हुए दिखाई देते हैं। गुरुदत्त विद्यार्थी के विचार भी बड़े नास्तिक थे पर बाद में बदल गए। स्वामी श्रद्धानंद के विचार भी बहुत नास्तिक थे पर बाद में बदल गए। ऐसे ही सैकड़ों उदाहरण हैं बाकि आप भी समझदार हैं और स्वयं विश्लेषण करें। परन्तु इसमें किसी को कोई सन्देह नहीं है कि भगत सिंह भारत के लाल थे, सच्चे सपूत थे। आज भी ऊर्जा भरने के लिये उनका नाम ही काफी है। वह ऐसे हुतात्मा थे जो कभी भुलाए नहीं जा सकते। बस यही कहना चाहूँगा –

निज आन-मान-मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे।

जिस देश जाति में जन्म लिया,बलिदान उसी पर हो जाएं।।

वह शक्ति हमें दो दयानिधे,कर्तव्य मार्ग पर डट जाएं।

पर सेवा, पर उपकार में हम,निजी जीवन सफल बना जाएँ।।

आज २३ मार्च शहीद दिवस है, मैं श्रद्धा से तीनों महान क्रान्तिकारियों सरदार भगत सिंह, हुतात्मा सुखदेव, अमर बलिदानी राजगुरु को नमन करता हूँ। उनके प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता हूँ।*-

आचार्य राहुलदेवः*

*🇮🇳 २३ मार्च बलिदान दिवस*🇮🇳 *

🔥 २३ मार्च १९३१ को महाबलीदानी सरदार भगत सिंह जी, बलीदानी राजगुरु जी, बलीदानी सुखदेव जी ने भारत माता के चरणों में हँसते हुए अपने जीवन को अर्पित कर दिया।

**🇮🇳 बलिदान दिवस पर उन्हें हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि व कोटि कोटि नमन् ।

*इस अवसर पर आइये जानें सरदार भगत सिंह को देश प्रेम की प्रेरणा कहां से मिली।

👉आर्यों द्वारा स्थापित डीएवी कॉलेज, लाहौर का भव्य भवन जहा पर भाई परमानंद जी ने भगत सिंह नाम की चिंगारी को मशाल में बदल दिया था…

*भगत सिंह के दादा श्री अर्जुन सिंह जी का यज्ञोपवीत संस्कार स्वयं “महर्षि दयानंद सरस्वती जी” ने ही करवाया था* और तो और दादा ने अपने दोनों पोतों का भी यज्ञोपवित संस्कार कराया था।*सरदार अर्जुन सिंह जी एक कट्टर आर्य समाजी थे। वे महर्षि दयानंद जी के आरम्भिक शिष्यों में से एक थे*लोगों ने तो मंदिर से आर्य समाज तक का सफ़र तय किया था *लेकिन सरदार अर्जुन सिंह जी ने गुरुद्वारे से आर्य समाज तक का सफर तय किया था।*उनको वैदिक साहित्य का इतना अध्ययन था की मूर्ति पूजा श्राद्ध आदि विषयों पर आर्य समाज की तरफ से शास्त्रार्थ करते थे । प्रतिदिन यज्ञ करना उनकी आदत थी । जब वे सफ़र में जाते थे तब भी अपनी हवन सामग्री यज्ञ कुंड इत्यादि साथ लेकर चलते थे ।

*जब उन्होंने अपने दोनों पोतों जगत सिंह और भगत सिंह का यज्ञोपवीत करवाया था तब उन्होंने अपने दोनों पोतो को दायं और बायं बाजू के नीचे लेकर ये प्रतिज्ञा ली थी कि मैं अपने दोनों पोतों को देश की बली वेदी पर दान करता हूँ।* भगत सिंह जी के पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह था और माँ का नाम विद्यावती था । दोनों परिवार सिख थे लेकिन *उनका विवाह आर्य समाज के तरीके से हुआ था अर्थात फेरे गुरु ग्रन्थ साहिब के स्थान पर यज्ञ वेदी के फेरे लिए थे ।

* उस समय लोगों ने कहा की देखो कैसा दामाद आया है जो खुद मन्त्र पढ़ रहा है ।*भगत सिंह जी के चाचा अजित सिंह जी भी दृढ़ आर्य समाजी थे*। आर्य समाज के लिए उन्होंने बहुत ट्रैक्ट लिखे जिनमें से *विधवा की पुकार* मुख्य है ।*भगत सिंह अपने दादा जी को जब भी पत्र लिखते थे तो ओ३म् और नमस्ते ही लिखते थे।

* भगत सिंह लाला लाजपत राय जी द्वारा संचालित नेशनल कोलेज के छात्र थे और प्रसिद्ध आर्य विद्वान जयचन्द्र विद्यालंकार , उदयवीर शास्त्री तथा भाई परमानन्द जी के शिष्य थे । *भगतसिंह का जनेऊ संस्कार “पूजनीय प्रभो हमारे….” के रचनाकार पूज्य लोकनाथ वाचस्पति जी द्वारा हुआ था ।* भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र तिरछी टोपी वाला आर्यसमाज कलकत्ता (विधान सारणी) में लिया गया था क्योंकी भगत सिंह ने लाहौर में सांडर्स को मारने के बाद वेश बदलकर वही शरण ली थी । *जय आर्य जय आर्यावर्त्त*

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