भाषा संबंधित दो भयंकर गलतियाँ:

0
120

अभिवादन में ‘नमस्ते’ के स्थान पर ‘नमस्कार’

आजकल रेडियो और टेलीविजन प्रसारणों में ‘नमस्कार’ शब्द का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। किन्तु व्याकरण की दृष्टि से यह एक अधूरा अभिवादन है। इसके विपरीत, ‘नमस्ते’ एक पूर्ण अभिवादन वाक्य है, जो संस्कृत व्याकरण के अनुसार सही और शुद्ध प्रयोग है।

‘नमस्ते’ की व्याकरणिक व्याख्या

संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रंथ पाणिनि की अष्टाध्यायी (सूत्र 2.3.16) के अनुसार ‘नमः’ शब्द चतुर्थी विभक्ति के साथ प्रयोग किया जाता है, जिससे ‘नमः तुभ्यम्’ बनता है। फिर ‘तेमयावेक वचनस्य’ (8.1.22) सूत्र के आधार पर ‘तुभ्यम्’ का संक्षिप्त रूप ‘ते’ हो जाता है। इस प्रकार ‘नमस्ते’ का अर्थ हुआ— “मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”

‘नमस्कार’ का व्याकरणिक विश्लेषण

संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘नमः’ शब्द से ‘कार’ प्रत्यय जोड़कर ‘नमस्कार’ शब्द बनता है, जो केवल भाववाचक संज्ञा है। यह स्वयं में पूर्ण वाक्य नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति सिर्फ ‘नमस्कार’ कहता है, तो व्याकरण के अनुसार यह अधूरा वाक्य है। इसे पूर्ण करने के लिए “मैं आपको नमस्कार करता हूँ” कहना आवश्यक है। अतः रेडियो, टीवी और अन्य सार्वजनिक मंचों पर शुद्ध अभिवादन हेतु ‘नमस्ते’ शब्द का प्रयोग ही उपयुक्त है।


आजकल बहुत से लोग ‘ज्ञान’ शब्द का गलत उच्चारण करते हुए ‘ग्यान’ बोलते हैं, जो व्याकरणिक रूप से अशुद्ध है।

संयुक्त व्यंजन ‘ज्ञ’ = ज् + ञ्
संस्कृत भाषा में ‘ज्ञ’ एक संयुक्त व्यंजन है, जो दो ध्वनियों ‘ज्’ और ‘ञ्’ के मेल से बनता है। इसे ‘ग्य’ की तरह उच्चारित करना अशुद्ध है, क्योंकि व्याकरणिक नियमों के अनुसार ‘ग’ और ‘ज्’ अलग-अलग ध्वनियाँ हैं।

यदि ‘ज्ञ’ को ‘ग्य’ पढ़ा जाता, तो ‘योग्यता’ को भी ‘योग्यता’ के स्थान पर ‘ग्य’ से लिखा जाता, जो व्याकरण के विरुद्ध होता। अतः स्पष्ट है कि ‘ज्ञान’ को ‘ग्यान’ कहना भाषा की दृष्टि से पूरी तरह से अशुद्ध है।

भाषा की शुद्धता और व्याकरण के नियमों का पालन करने के लिए—

  1. नमस्ते’ का प्रयोग करें, न कि ‘नमस्कार’।
  2. ज्ञान’ का शुद्ध उच्चारण करें, न कि ‘ग्यान’।

रेडियो, टेलीविजन, और सार्वजनिक मंचों पर शुद्ध भाषा का प्रचार आवश्यक है ताकि सही अभिव्यक्ति और भाषायी शुद्धता बनी रहे।