यह जीवन अनमोल तेरा

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यह जीवन अनमोल तेरा

प्रभु चरणों में, बैठ श्रद्धा से
अपना मन चित्त, हृदय सजा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा
प्रेमाश्रु से, गद्-गद् होकर
निशदिन गीत, प्रभु के गा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

व्यर्थ चले, जीवन रथ पहिया
राग द्वेष के, दुर्गम पथ पर
हिंसक स्वार्थ, भरी वाणी से
करता टुकड़े, जीवन-रथ के
जिस वाणी का, प्रभु ना साक्षी
वाणी वह क्यों, बोले भला
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

या वाणी ले, नाम प्रभु का
या वाणी, चुप ही रह जाए
ऐसी वाणी, कभी ना बोलें
जो प्रभु से, हमें दूर हटाए
बचना चाहो, यदि विनाश से
मधुमय वाणी, बोलो सदा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

जागो आज से, एकमात्र उस
इन्द्र प्रभु की, स्तुतियाँ कर लो
इस सन्सार के, यज्ञ में मिलकर
प्यारो! प्रभु की, भक्ति कर लो
केवल प्रभु सुख – सौभाग्य की
करता है मंगल वर्षा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

सर्व समर्थ है, इक परमेश्वर
सब कुछ जो, दे सकता है
उसके सिवा ना, योग्य कोई
ना उसके जैसी, समता है
उस अनन्त सर्वशक्तिमान को
तन्मय होकर ही भजना
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

प्रभु चरणों में, बैठ श्रद्धा से
अपना मन चित्त, हृदय सजा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा
प्रेमाश्रु से, गद्-गद् होकर
निशदिन गीत, प्रभु के गा
यह जीवन अनमोल तेरा
यह जीवन अनमोल तेरा

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
रचना दिनाँक : १८.८.१९९९ २३.३०रात्रि

राग :- कामोद
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा 8 मात्रा

शीर्षक :- हे प्रभु! तेरे गीत गाएं 🎧वैदिक भजन ७५५ वां
*तर्ज :- *
752-00153

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
हे प्रभु! तेरे गीत गाएं

भाइयों! उस प्रभु के सिवाय इस संसार में हमारा कोई अन्य स्तुति करने योग्य नहीं है। किसी भी अन्य की स्तुति करने से हमारा कुछ बनेगा नहीं और हम जो यूं ही दिन भर बोलते रहते हैं, उससे अपनी हानि ही करते हैं। जो वाणी प्रभु- सेवा के उद्देश्य से उच्चारण नहीं की जाती, जो परमात्मा को साक्षी रखकर नहीं बोली जाती, जिसका प्रभु से कोई सम्बन्ध नहीं होता–ऐसी सब हमारी वाणी न केवल वृथा है, किन्तु हमारा नाश करने वाली है। जैसे मेंढक के टर्र -टर्र करने का और कुछ परिणाम नहीं होता, सिवाय इसके कि सांप को अपने भक्ष्य का पता मिल जाता है, उसी तरह मनुष्य अपने निरर्थक और परमेश्वरहीन प्रलापों के करते रहने के काल का ही शीघ्र ग्रास हो जाता है। इसलिए हे मनुष्य–जन्म पानेवालो! हे सखाओ! तुम क्यों यूं ही विनष्ट होते हो? अपने प्रभु के सिवाय क्यों अन्यों की स्तुति करके हिंसित होते हो? स्वार्थ, हिंसा, राग, द्वेष से भरी वाणीयां बोल-बोल कर क्यों हिंसक बनते हो और फलत: स्वयं भी नष्ट होते जाते हो? यदि तुम निरन्तर प्रभु नाम नहीं ले सकते हो तो कम से कम चुप रहो, पर किसी अन्य अस्तुत्य की स्तुति तो ना करो! ऐसी वाणी तो ना बोलो जो तुम्हें प्रभु से हटाकर विनाश की ओर ले जाने वाली हो! इसलिए भाइयों! जागो, आज से एकमात्र उस इन्द्र का ही दिन-रात स्तवन करो, सब अभीष्टों को बरसाने वाले सर्वशक्तिमान केवल उस परमेश्वर का ही स्तुति- कीर्तन करो। इस संसार-यज्ञ में सम्मिलित सब सखा मिलकर उस परम प्रभु के स्तोत्रों को गुंजाओ, अपने प्रत्येक यज्ञ-कर्म में उसे इन्द्र प्रभु में ही निमग्न होकर गुण-गान गाओ। तनिक देखो, उस ‘वृषण'(अभीष्टों को बरसानेवाले)प्रभु के सिवाय इस संसार में और कौन है जो हम पर सब सुखों और अभीष्टों को बरसा रहा है? हम यूं ही मूर्खतावश कभी किसी मनुष्य, स्वामी व राजा को या किसी अन्य शक्ति को समर्थ समझकर उसकी स्तुति में लग जाते हैं, परन्तु देखो! उस सर्वसमर्थ परमेश्वर के सिवाय हमारा और कौन है जो हमें सब- कुछ प्रदान कर सकता है?
अतः आओ ! अब हम सदा उसके ही गीत गाएं और सब कुछ भूल जाएं, मस्त होकर उसके ही स्तोत्र बार-बार गायें और सुनाएं, प्रेमाश्रु से गद् -गद् होकर उसके ही गीत निरंतर गाते जाएं। और उसके गीतानन्द में खो जाएं।