ओ भोले पंछी सोच जरा, तेरा असली कहाँ ठिकाना है।

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वैराग्य

ओ भोले पंछी सोच जरा,
तेरा असली कहाँ ठिकाना है।
इस दुनियाँ की रंगरलियों पे,
तू क्यों हो गया दीवाना है।।
ओ भोले भाले पंछी सोच जरा, तेरा ………

तू इस माया के फूलों को,
क्यों देख-देख कर फूला है,
इस चमन की मस्त बहारों में,
खुद अपने आपको भूला है।
जो फूल खिले हैं आज यहाँ,
कल उनको भी मुरझाना है।।
ओ भोले भाले पंछी सोच जरा, तेरा………

ये जीवन एक कहानी है
बस दो दिन की जिन्दगानी है,
यहाँ टिककर कोई रहा ही नहीं,
यह दुनियाँ आनी जानी है।
इस बात को भूलना मत पगले,
तुझको भी एक दिन जाना है।।
ओ भोले भाले पंछी सोच जरा, तेरा………

कुछ सोच ले उठ नादान जरा,
कर ले सुमिरन भगवान जरा,
पुण्य पाप की गठरी जो बांधी,
उस पर भी कर ले ध्यान जरा।
ये वक्त अमोलक जीवन का,
फिर लौट के हाथ ना आना है।।
ओ भोले भाले पंछी सोच जरा, तेरा……..