जिस तरह भी हो सके, सत्संग में आना चाहिए।

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सत्संग

जिस तरह भी हो सके,
सत्संग में आना चाहिए।
प्रेम से नित ईश के,
गुणगान गाना चाहिये।।
मन की शुद्धि के लिये,
ईश्वर की कर उपासना।
पाप रूपी वासनाओं को
मिटाना चाहिये।।
वेद के अनुसार जीवन के
बिताना चाहिये।।
जिस तरह भी हो सके…….

यज्ञ और सन्ध्या हवन,
नियम बना हर रोज का।
उस प्रभु से शान्ति का,
वरदान पाना चाहिये।।
जिस तरह भी हो सके………

सत्संग ऐसा है जो,
मिटाता तीन तापों को।
आनन्द रूप भगवान् से,
यह ज्ञान पाना चाहिये।।
जिस तरह भी हो सके……..

आदमी एक पत्थर को काट कर उसे शक्ल देता है, फिर उसे अपना भगवान मानता है, फिर उसी से डरता है, क्या यही पूजा है?