आस्था
मुझे आसरा है प्रभु बस तुम्हारा।
तुम्हें छोड़ अब कौन सा लूँ सहारा।
भँवर बीच चक्कर पड़ा खा रहा हूँ।
न देखा कभी शान्ति सुख का किनारा।।
मुझे आसरा है प्रभु ……….
तिमिर घोर मानस भवन में है छाया।
करो दूर अपनी परम-ज्योति द्वारा।।
नहीं कोई तुम सा सुना है हितैषी।
लिया देख मैंने है संसार सारा।
मुझे आसरा है प्रभु ……..
सुखी वह तुम्हारा किया जिसने सुमिरन ।
दुःखी वह है कि जिसने तुम्हें है बिसारा।।
हृदय कुंज उजड़ा हुआ फिर हरा हो।
बहा दो जो तुम स्नेह की वारि-धारा।।
मुझे आसरा है प्रभु ……..
कहेगा तुम्हें कौन फिर करुणा-सिन्धु
‘प्रकाश’ आर्य को जो न तुमने उबारा।।
मुझे आसरा है प्रभु ……….










