संस्मरण समारोह
दिनांक 25 अक्टूबर 2024 दिन शुक्रवार
समय – प्रातः 09 बजे से 01 दोपहर तक
स्व दाऊ तुलाराम आर्य परगनिहा जी
स्थान – जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय प्रांगण भींभोरी जिला बेमेतरा (छ. ग.)
छत्तीसगढ़ प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा
प्रति,
मान्यवर,
छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र, दानवीर, भामाशाह स्व दाऊ तुलाराम आर्य परगनिहा जी द्वारा समाज के लिए पुण्यकर्मों का संस्मरण समारोह निम्नलिखित कार्यक्रमों के साथ आयोजित है –
कार्यक्रम विवरण
प्रातः 09 बजे से 10 बजे तक यज्ञ, हवन (आचार्य कर्मवीर शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में)
प्रातः 10 बजे से 11 बजे तक आर्यवीर / वीरांगना दल का प्रदर्शन (आचार्य सत्यम जी, अभिलाषा जी, रूपेंद्र आर्य जी के नेतृत्व में)
प्रातः 11 बजे से 11.15 बजे तक – अतिथियों का स्वागत
11.15 बजे से 11.30 बजे तक – स्वागत, सांस्कृतिक कार्यक्रम
11.30 बजे से दोपहर 01 बजे तक – उद्बोधन, समापन
छत्तीसगढ़ प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा
कार्यक्रम समाप्ति पश्चात प्रसाद (भोजन)
कार्यक्रम में सहभागिता
मुख्य अतिथि- श्री दीपेश साहू, माननीय विधायक, बेमेतरा विधान सभा क्षेत्र
विशिष्ठ अतिथि- माननीय विनय आर्य जी, मंत्री दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
विशिष्ठ अतिथि- माननीय जीव वर्धन जी शास्त्री, मंत्री, राजस्थान आर्य प्रतिनिधि सभा
अध्यक्षता- श्री बिसरा राम यादव जी, पूर्व प्रांतीय संघ चालक (छत्तीसगढ़)
विशेष आशीर्वचन -आचार्य राकेश जी के साथ आपकी गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न होगा।
निवेदक –
प्रधान – डॉ राम कुमार पटेल
मंत्री – अवनी भूषण पुरंग
कोषाध्यक्ष – आचार्य जगबंधु आर्य

कार्यक्रम
संयोजक – कपिल देव शास्त्री जी
व्यवस्थापक – संतोष वर्मा
छत्तीसगढ़ प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा
दानवीर तुलाराम परगनिहा जी का पुण्य स्मरण

दानवीर श्री तुलाराम परगनिहा द्वारा दिनांक 26-06-1926 को स्त्री शिक्षा, संस्कृत तथा वैदिक शिक्षा के प्रसारण हेतु छत्तीसगढ़ में आर्यसमाज की स्थापना किये ।
धर्म नगरी इलाहाबाद से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर छत्तीसगढ़ का प्रथम स्नातक होने का गौरव प्राप्त किया। स्व श्री तुलाराम परगनिहा ने शासकीय सेवा करने का निश्चय किया। सन् 1905 (42 वर्ष की उम्र) में वे तहसीलदार के पद पर सागर में पदस्थ हुए।
शासकीय सेवा से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् अपने परिवार सहित सन् 1925 ई. में पैतृक गांव छोड़कर कूंस (धरसींवा) जिला रायपुर आ गये। इनका झुकाव प्रारंभ से ही आर्यसमाज की ओर था और अब उन्होंने निश्चिय किया कि अपनी पूर्ण सम्पत्ति को राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरुप संस्कृत शिक्षा, स्त्री शिक्षा, वैदिक धर्म प्रचार और अनाथ सेवा में समर्पित कर देगे।
छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व त्याग कर निःस्वार्थ भाव से छत्तीसगढ़ का विकास चाहा हो। संस्कृत शिक्षा के प्रति उनकी विशेष आस्था था। स्त्री शिक्षा के वे जबरदस्त पक्षधर थे। अनाथ बच्चों के प्रति उनके मन में दया का भाव विद्यमान था। इसलिए अपनी वसीयत में अपनी अंतिम इच्छा इस प्रकार व्यक्त किया 卐मेरी यह प्रबल इच्छा है कि मेरी जायदाद किसी व्यक्ति विशेष के उपयोग में न आवे और कोई व्यक्ति विशेष उसका स्वामी नहीं हो, बल्कि मेरी यह प्रेरणा है कि मेरी सम्पूर्ण जायदाद किसी पुण्य कार्य में लग जावे और ऐसी संस्था के स्वामित्व में जावे जो कि सुसंस्कृत विद्या दान, स्त्री शिक्षा, गुरुकुल, अनाथ रक्षा आदि के लिए प्रयत्न करती हुई वैदिक धर्म का प्रचार व विस्तार में लगी रहती है। सब बातो को अच्छी तरह सोचकर और बहुत विचार के बाद मैंने यह पक्का निश्चय किया है कि मेरी जायजाद मेरे मरने के बाद आर्यसमाजी संस्था को जावे।卐 अपनी इच्छा को मूर्तरूप प्रदान करने का दायित्व सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली एवं जालंधर कन्या महाविद्यालय के संचालकों पर छोड़ दिया कि वे इस जायदाद से छत्तीसगढ़ के किसी स्थान में कोई विद्या दान की संस्था, स्त्री शिक्षा के लिए विद्यालय जालंधर कन्या विद्यालय के नमूने पर चलावें । इस प्रकार छत्तीसगढ़ के इस सपूत ने छत्तीसगढ़ में आर्यसमाज की नींव डाली। दिनांक 26 जून 1926 ई. मिती जेठ सुदी 14, संवत् 1983 के दिन उनके वसीयत पर हस्ताक्षर हुए। गवाह के रुप में उनके भाई दाऊ उदयराम परगनिहा एवं सोन पैरी वाले हेमनाथ ब्राह्मण मालगुजार के हस्ताक्षर कर यह वसीयत 03 जुलाई 1926 को विधिवत पंजीकृत हुआ। इसके कुछ समय बाद ही 25 अगस्त 1926 को तुलाराम जी परगनिहा का स्वर्गवास हो गया।










