सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

0
97

प्रार्थना

सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

तेरी दया, सुगन्धि हर गुल से आ रही है ॥

रवि, चन्द्र और तारे, तूने बनाये सारे ।

उन सबमें तेरी ज्योति, बस जगमगा रही है ॥

विस्तृत वसुन्धरा पर सागर बनाये तूने ।

तह जिनकी मोतियों से अब चमचमा रही है ॥

दिन, रात, प्रातः सायं, मध्याह्न भी बनाये।

हर ऋतु पलट-पलटकर करतब दिखा रही है ॥

सुन्दर सुगन्धि वाले पुष्पों में रंग तेरा।

यह ध्यान फूल, पत्ती तेरा दिला रही है ॥

हे ब्रह्म विश्वकर्ता वर्णन हो तेरा कैसे ।

जल, थल में तेरी महिमा हे ईश छा रही है ॥

हम सब तेरी शरण हैं, तुझसे यहीं विनय है।

हो दूर यह अविद्या, हमको भुला रही है ॥