दयानन्द बावनी
कवि — दूलेराय कराणी
निःस्पृहता
उदयपुर राजन सज्जनसिंह ने एक समय।
स्वामीजी को बात एक बताई ईनाम की॥
महर्षि न कीजे मूर्तिपूजा का विरोध अब।
लीजिए जागीर आप एकलिंगधाम की॥
सारे धर्म-धामहु के बनादूँ महन्त बड़े।
और भी दिलाऊँ जायजाद लाख दाम की॥
महर्षि कहत वेद-धर्म के विरुद्ध यह।
तुच्छ जायजाद न हमारे कुछ काम की॥ ३३॥
























