विदुषी विद्योतमा, हम अपने शब्द वापस लेते हैं।यह वचन थे करपात्री महाराज के।
सन 1969 ईस्वी में पौराणिकों की वाराणसी में एक विराट सभा हुई, जिसमें शंकराचार्य,श्री माधवाचार्य, स्वामी करपात्री, श्री प्रेमाचार्य सहित अनेक विद्वान उपस्थित थे।सभा में जब महर्षि दयानंद के प्रति मिथ्या,अनुचित आलोचना की गई, तब अपार भीड़ में से एक तेजस्विनी उठ खड़ी हुईं।धाराप्रवाह संस्कृत में दिए गए शास्त्रार्थ-चुनौती ने समस्त विद्वज्जनों को मौन कर दिया।वह अप्रतिम विदुषी थीं —आचार्य डॉ. सावित्री देवी शर्मा,जो आर्य समाज की शास्त्रार्थ परंपरा की अग्रणी धुरंधर मानी जाती हैं।उनकी अप्रतिम प्रतिभा से प्रभावित होकर करपात्री जी स्वयं उन्हें मंच पर बुलाकर आधुनिक विद्योत्तमा’ की उपाधि से सम्मानित करते हैं,और अपने पूर्व कथनों के लिए क्षमा भी मांगी।










