व्यापक सोम

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असृक्षत॒ प्र वा॒जिनौ गुव्या सोमा॑सो अश्व॒या। शुक्रासौ वीर्याशवः

।। ऋः ६.६४.४

तर्जः मैत्रीनो अजुनका

वाणी में जादू तो सन्त जगायेगा, अपने तक नहीं प्रभाव परिमित
स्त्रोत संजीवन का अनुगृहीत, तेज-शक्ति से जो है आनीत
रसमय स्फूर्तिदायक नीक क्रियात्मक शिक्षा सिखायेगा।
॥ वाणी में॥

पवित्रता उसकी इतनी महती, देह में कत सीमित रह सकती?
प्रथित प्रवचन से सर्वाच्छादित, भ्रम बाधा विघ्नों को हरती
संत क्षेत्रज्ञ बढ़ जायेगा।
॥ वाणी में॥

निज वाणी के प्रहार से तब, कर देगा दुर्गुणों को हतप्रभ
कोई संकोच कृपणता उसके, उपदेशों के सम न ठहरे
भासुर भाव वो जगायेगा।
॥ वाणी में॥

वैर-द्वेष का नाश वो करता, शत्रु समयक, मित्र ही बनता
और विचारक समचित बनता, नवयुग का निर्माण सन्त करे
विश्व शांति तब पायेगा।
॥ वाणी में॥

ज्यों-ज्यों आगे समय बीतता, आध्यात्मिक संजीवन बढ़ता
अधिक तेज व्यापक हो निखरता, प्रभु प्यारा प्रजा-प्यारा बनता
क्रांति संत ही लायेगा। ॥ वाणी में॥

यही ‘शुक्र’ है यही है ‘वाजी’, आशुसोम वो वही प्रतापी
शक्ति से शुक्र, वाज से वाजी, सवन से सोम बने अनुरागी
रंग सन्त का चढ़ जायेगा। ॥ वाणी में॥

(परिमित) अल्प, थोड़ा। (अनुगृहीत) जिस पर कृपा दिखाई गई हो। (आनीत) लाया हुआ।
(नीक) स्वच्छ। (प्रथित) प्रसिद्ध। (हतप्रभ) प्रभारहित। (भासुर) प्रकाश
देनेवाला। (शुक्र) अगिन। (वाजी) शक्तिशाली।