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धर्म के लक्षण

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सं गच्छध्वं सं व॑दध्व॒ सं वो मनांसि जानताम् ।

दे॒वा भागं यथा पूर्व संज्ञानाना उपासते

। ऋः १०. १८१.२

तर्जः मेले विन्निन मुत्ततारी

ऐ प्यारे मनुष्य लोगों, उसी धर्म को ग्रहण करो जो
पक्षपात रहित है न्याय प्रधान
उससे ना विपरीत चलो तुम, जिससे बढ़ता जाए सुख धन
सम्मति रहे परस्पर निष्ठावान ।
विरुद्धभाव को छोड़ परस्पर प्रश्नोत्तर-संवाद करो तुम।
सब सत्यों का वर्तित वेद प्रमाण॥
॥ऐ प्यारे ॥

अपने सही वेदज्ञान को सतत दिनों दिन बढ़ाओ
होवे मन ज्योतित मृदु-महान
जिससे सतत ज्ञानी होकर नित्य रहें आनन्द रत
बनें धर्म हेतु निष्काम
जगत में जो भी हैं धर्मी, बनते हैं वो ही सुकर्मी
वेदों से शिक्षा लेकर आते हैं प्रभु की शरणी
इसलिये पा लो ज्ञान और बनो सत्यवान॥
॥ऐ प्यारे ॥

तीन रीत से नित धर्म, करता जाता आत्मोत्थान
प्रथम हैं शिक्षा के विद्वान
दूसरा आत्मा की शुद्धि, सत्य ज्ञान की शुभेच्छा
तीजा वेद का निष्ठावान
वेदों की ही शिक्षा से होता है बोध सच का
वरना अज्ञान के कारण जीवन तो बोझ ही बनता
सब विचार होवें आदान-प्रदान निष्ठावान ॥
॥ऐ प्यारे॥

(वर्तित) संपादित, चलाया हुआ, ठीक किया हुआ। (निष्ठावान) श्रद्धा से युक्त।