आ पवस्य दिशां पत आर्जाकात् सौम मीङ्कः ।
ऋत॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्रृद्धया॒ तप॑सा सुत इन्द्रायन्द्रो परिं स्रव ऋः ६.११३.२
तर्जः मुटुवा गवेतु कवि मृदुव
ज्ञानमय भक्तिभाव सूच
आत्मा में होओ परिस्त्रुत॥
कर दे पावक प्यारे सोम प्रभु (2)
ऊँचे से ऊँचा मोक्ष सुख देना तू (2)
हे ज्ञानमय…
चारों दिशाओं में तुम बसने वाले (2)
रस प्रदान, परिपालन करने वाले (2)
हे ज्ञानमय…
अद्भुत ! महिमा तेरी, हे ज्ञान चक्षु ! (2)
अविनाशी सर्व प्रकाशों के हो केतु (2)
हे ज्ञानमय…
समता ऋजु भाव तुझमें छल भी नहीं (2)
सबके रोम रोम में तुम बहाते हो नदी (2)
हे ज्ञानमय…
सत्य वचन सत्य कर्म वाले नियम (2)
श्रद्धा तप बिना बनते ना प्रेम के भाजन (2)
हे ज्ञानमय…
इन सब से प्राप्त होते भक्ति के भाव
इसके बिना भक्तिरस का होता है अभाव (2)
हे ज्ञानमय…
अटल श्रद्धा, धार के मुझमें आ जाओ।
प्यासे इन्द्र को सोम का अमृत पिलाओ॥ (2)
हे ज्ञानमय…
(सूच) पवित्र (परिस्युत)। (केतु) मुख्य, नेता। (ऋजु) सरल (भाजन) पात्र।










