हे मित्र मुझे क्यों मारना चाहते हो?

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किमार्ग आम वरुण ज्योष्ठं यत् स्तो॒तार॒ जियाँ मसि सखायाम् ।

प्र तन्में वोचो दूळभ स्वधावो ऽवं त्वानेना नमसा तुर ईयाम्।। ऋः ७. ८६.४

तर्जः मुत्तु चिपि पोलुरु कत्तिनुम्ले वन्नुरू

हर श्वास में हर आस में तेरा नाम लिखा
रक्षक बनके राह दिखाना हे प्रभु परम सखा ।

मुझे मत मारो हे तारक! हे परिपावन !
स्तोता हूँ प्रभु दर्शन दो मेरे मनभावन॥
तुम हो सखा हो समख्यावन
मित्र हो प्यारे भगवन्
करूँ मैं तेरा गुण-कीर्तन,
शुद्ध होवे मन, आचरण
॥ मुझे मत मारो॥

क्या मैंने पाप किया है? या किसको त्रास दिया है
कोई तो कारण होगा, ना अब तक मुझको माफ, किया है
स्तवन नित आपका करता, समर्पण भावों को भरता
तुम प्यारे मित्र हो मेरे, इसलिए सुख दुःख में याद करता
जो मुझको है मिला, जीवन नया, इसे देने वाला कौन?
आर्द्रमान, हे प्रभु, प्यारे विभु, क्यों तुम रहते हो मौन ?
तो दो शुभ दर्शन ॥
॥ मुझे मत मारो॥

तेरे सज्ञान गुणों का, करूँगा पालन भगवन्
दया सत्य न्याय अहिंसा, इनको समझ के कर लूँगा, धारण
हो तुम प्रभु ‘स्वधावान्’, हो सर्वशक्तिमान्
और उसपे हो तुम दुर्लभ तुझपे ना कोई है किसी का दबाब
तू मुझको दर्श दे, मुझे हर्ष दे, तू बता दे मेरा पाप
ताकि जाऊँ सम्भल, कर दे प्रबल, बने ना मेरे कर्म श्राप
शुद्ध कर लूँ जीवन ॥
॥ मुझे मत मारो॥

बिना दर्शन के तेरे, उदासी छाई भगवन्
मेरी तड़पन को जानो, तेरे दरस बिना क्या है जीवन
और ना मुझे तरसाओ, मैं जीते जी मरता हूँ
सार्थक मेरा नमन हो, हाथ जोड़ विनती मैं करता हूँ
बन जाओ! तुम सहाय, हूँ असहाय, निष्पाप कर दो तुम
हितैषी हाथ तेरे, मेरे पाप हरें, लगी मन में तेरी धुन
मिले तेरा आयतन ॥
॥ मुझे मत मारो॥

(सखा) समान स्वभाव वाला, ज्ञानी और ज्ञानपूर्वक आचरण करने वाला। (स्वयावान)
स्व शक्तिवाला। (आयतन) आश्रय सहारा। (दूडभ) किसी से ना दबने वाला (भगवान)