हे राजन् वचन दो !

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त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि । स यामनि प्रति श्रुधि

॥२० ऋः १. २५.२०

तर्जः मुळिगलुम मौनम गणम

सत्यवचन वाचाल का, देना प्रभु अनुराध का
रक्षण तेरा है कमाल का, गुण है तेरा प्रतिपाल का

रक्षण कर दो मंगल, मेरा भावों भरा है मन

राजा तू है ब्रह्माण्ड का, महिमा भरे गुणगान का
है प्रार्थना तेरे भक्त की, भावों भरे अनुरक्त की सत्यवचन…
सारा विश्व तेरी वश्यता में प्रभु, हे विश्व-हितु
प्रखर बुद्धि से चला रहा अणु-अणु, तू है विभु
तू है इतना महान, तेरी वितत पहचान
तुझे विनत में होके कहूँ, फरियाद मैं तुझ से क्यों न करूँ?
मेरा एक ही विश्व में तू ही तू

राजा है तू ब्रह्माण्ड का, महिमा भरे गुणगान का
है प्रार्थना तेरे भक्त की, भावों भरे अनुरक्त की सत्यवचन…

इसी भावना से मैं भरा हूँ प्रभु, शरण में आया हूँ
मुझको वचन देना तेरे लिए प्रभु, बात अत्यंत लघु
मैं तो तुमसे वचन लिये बिना ना माँनूं
ये तो प्रेम भरी मेरी गुफ्तगू
मेरा प्रेम है प्रकट, मैं तेरा पूर्ण भक्त
मेरा आग्रह है मीठा, हे मालिक मिट्टू !

राजा है तू ब्रह्माण्ड का, महिमा भरे गुणगान का
है प्रार्थना तेरे भक्त की, भावों भरे अनुरक्त की ॥ सत्यवचन ॥

(वाचाल) बोलने में चतुर। (अनुराध) प्रार्थना। (वश्यता) वश में होने की अवस्था। (हितु)
हित चाहने वाला। (विभु) सर्वव्यापक परमात्मा। (लघु) छोटा, कनिष्ठ। (गुफ्तगू) विचार
विमर्श। (मिट्टू) मीठा बोलने वाला।