अहर्निश प्रवृत्त स्तोम

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मम त्वा सूर उदिते मम मर्ध्यान्दने दिव्यः ।

मम प्रपित्वे अपिशवरे वसवा स्तोमासो अवृत्सत ॥ ऋः ८.१.२६

तर्जः मुंजई कुटुमवालुम कुटुम पार्ते

प्रभु तेरी महिमा हम गाते, स्तुति प्रणति से तुझे ध्याते
हे मेरे इन्द्रदेव, असहाय के सहाय, सर्वदा सर्वथा, तेरी स्तुति हो अपाय
अन्धकार चीर करके ले आते पवित किरणें लाके धरती को जगमगाते ॥
॥ प्रभु तेरी॥

परम द्योतित सूर्य लालिमा, उषा काल में उदित हो रही
पावन वेला, स्तोत्र तुम्हारे हृदय वाणियाँ मस्त हो रहीं
रात्री के गमन या दिन के आगमन का (2)
मनमोहक घटना, घड़ी है, ये तेरी ही कृति॥
॥ प्रभु तेरी ॥

जब मध्याह्न में मरीचिमाली, गहन गगन के मध्य विराजे
पूर्ण तीव्रता से वो तपता, ऐसे समय भी स्तोत्र हैं गाते
तीव्रतम प्रभा के स्त्रोत भी तुम्हीं हो (2)
चढ़ता सूर्य है तपी उसमें तेरी ही ज्योति
॥ प्रभु तेरी ॥

जब सन्ध्या में, सूर्य देवता, मरीचियों को लगा समेटने
बिखर रही है सान्ध्य-रक्तिमा, भाव-विभोर मैं गाता महिमा
मध्यकाल के मोहक दृष्यों का तू सृष्टा (2)
ये तेरी ऐश्वर्य शक्ति हे विभु तेरी विभूति॥
॥ प्रभु तेरी ॥

शुक्लपक्ष की सौम्य चाँदनी, कृष्ण वसना है अँधियारी
धुः पर खिलती तब तारावली खेल ये सुन्दर कब से जारी
तेरे सब प्रकाशों का पाते हैं हम प्रदि (2)
ज्योत्सनामयी सर्वरी, या विभासित ये रवि
॥ प्रभु तेरी ॥

सबल स्त्रोत मम तुम्हें रीझाते, विभिन्न कालों में उमड़ाते
तब मैं और तुम मिलके रचाते, कवि गोष्ठियाँ प्रख्य प्रज्ञासे स्तुति
गान गाता हूँ मैं तुम्हारे यश के (2)
प्रेरक गीत मेरे लिये गाते हो गायक कवि॥

(अपाय) पाप रहित। (पवित) शुद्ध। (योतित) प्रकाशित। (स्त्रोत) स्तुति, महिमा। (कृति)
कार्य। (गहन) अथाह। (मरीचि) किरण। (मरीचिमाली) सूर्य। (विभु) सर्वोपरि। (सौम्य)
शांत, गम्भीर। (शुक्लपक्ष) मास का सुदीपक्ष। (तारावली) तारों का समूह। (प्रदि) उपहार,
भेंट। (सर्वरी) रात्री, विभावरी। (प्रख्य) स्पष्ट, साफ।