युत्किं च॒दं व॑रुण दैव्ये॒ जन॑ऽभिद्रोहं मनुष्याई भरांमसि ।
अर्चित्ती यत्तव॒ धर्मायुयोप॒म मा न॒स्तस्मा॒देन॑सो देव रीरिषः ॥ अथ. ६.५१.३
तर्जः मी पाहतो स्वप्नी तुला
तुम दैव्य मन हो हे वरुण हम पतित मानव हैं सभी
हम गिरें तो पड़तों को उठाओ हे दयामय हे हरि॥
॥ तुम ॥
हम द्रोह करते हैं सभी (2) ना धर्म पे चलते सही
तेरा धर्म सत्य अखण्ड है, क्यों पाते ना तेरी निधी॥
॥ तुम ॥
तेरे सत्य-धर्म की देन को क्यों खो रहे व्यवहार में?
कितना बड़ा ये द्रोह है भोगेंगे हम कहीं ना कहीं॥
॥ तुम ॥
अस्तेय दम क्षमा धैर्य शम ये सब सनातन धर्म हैं
पर हम परिपालन में इनकी डालते कितनी हवि ॥ ॥ तुम ॥
हे देव तुमसे है प्रार्थना ना दण्ड हमको कठोर दो
कर दो क्षमा हे दयाग्रणी! ना धर्म-भंग करें कभी॥
॥ तुम ॥
या तो अज्ञान प्रमाद है या है ये असावधानी ।
आखिर तो हम अल्पज्ञ हैं सर्वज्ञ हो दयावान तुम्हीं॥
॥ तुम ॥
तेरे राज्य में ना हो राजद्रोह, जानूँ अक्षम्य अपराध है
कैसे बने मन द्रोह का जब तेरी शक्ति है अग्रणी॥
॥ तुम ॥
दयामय करो कल्याण तुम, यही प्रार्थना तुमसे मेरी
सान्निध्य से निज प्रेम दो, प्रभु हम बने आत्म त्यागी॥ ॥ तुम ॥
बस गिड़गिड़ा के रोने दो, ये पश्चाताप पाले धृति
ताके जागे सत्य-धर्म की, ये प्रीत सच्चे हृदय की॥ ॥ तुम ॥
(हरि) इन्द्र, शिव, यम, ब्रह्मा, सूर्य। (द्रोह) षडयंत्र। (दयाग्रणी) दया में आगे। (अस्तेय)
चोरी न करना। (दम) इन्द्रिय दमन। (शम) शान्ति। (अग्रणी) सबसे आगे।










