आत्मा का स्वराज्य

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अत्रि॒मनु॑ स्व॒राज्य॑म॒ग्निमुक्थान॑ वावृधुः। विश्वा अघि श्रियाँ दथे।

॥ ऋः २.८.५

तर्जः मारगड़ी तिंगड़ अल्लवा-1126 राग भैरवी

कर्म फल भोगने आया, कार्य नये करने आया
त्रिविध दुःखों ने सताया, बार बार इस देह में आके
कर्म का फल पाया ॥ ॥ कर्मफल ॥

ये त्रिविध दुःख, आध्यात्मिक, अधिभौतिक-दुःख अधिदैविक
दुःख तीनों ही, मन के द्वारा, आत्मा अनुभव करता सारा।
यदि मन बुद्धि हो सदोष (तो), आत्मा पाता असंतोष
रुग्ण अशक्त देह इन्द्रियों ने
अधिभौतिक, दुःख, अनुभव करवाया। ॥ कर्मफल ॥

विद्युत्पात अनावृष्टि, भूकम्प दुर्भिक्ष अति वृष्टि
अधिदैविक दुःख का आगमन, करते उत्पात उच्छेदन
आत्मिक वाचिक दैहिक दोष, इसी तरह देते हैं क्षोभत्रिविध
दोष से विरक्त आत्मा बनता स्वराज्यक, कहाता अत्रयात्मा॥
॥ कर्मफल॥

मन इन्द्रियों के कृत्य-स्तुतिगीत, अत्र्यात्मा को करते विनीत
होती आत्मा महिमान्वित, कटते सारे दुःख त्रिविध
आत्मा धारे शोभायें, पायें श्री, श्रिय, शुचितायें
राष्ट्रात्मा बन यश भी कमाये
पाये, महिमा, गरिमा, शोभा, आभा॥
॥ कर्मफल ॥

बनती स्वराज्यावस्था, आत्मा पाता दृत-सम्पदा
दुर्मद-दुर्मना-दुवन, यदि तजे वृत्तियाँ अधम
आत्मोत्सर्ग से जीवन साधें, खुद को ईश की डोर से बाँधे
श्री सम्पदा क्यों कर खोयें?
आओ खुद को अत्रि बनायें
त्यागें तमोगुण पायें प्रभु-छाया॥

(त्रिविध दुःख) तीन प्रकार के दुःख (आध्यात्मिक, अधिभौतिक, अधिदैविक)। (अनावृष्टि)
वर्षा का न होना। (दुर्भिक्ष) अकाल। (उच्छेदन) विध्वंस, नाश। (वाचिक) वाणी से।
(क्षोभ) दुःख । (विरक्त) अलगाव। (अत्रयात्मा) अत्रि, तीनों दुःखों से छुटने वाला। (श्रिय)
मङ्गल। (शुचिता) शुद्धता। (दृत-सम्पदा) सम्मानित धन ऐश्वर्य। (आत्मोत्सर्ग) आत्मा
का त्याग। (दुर्मद) मद में चूर। (दुर्मन) बुरा मन। (दुवन) बुरा मनुष्य।