एक अविनाशी अजन्मा विश्वधर धाता तू ही।
एक अविनाशी अजन्मा विश्वधर धाता तू ही।
लोक-नायक न्यायकारी तू पिता माता तू ही ॥
धर्मरक्षक तापहारी भक्त जन त्राता तू ही।
सर्व मङ्गलमूल शङ्कर सर्व-सुख-दाता तू ही ॥
यों सदा सद्भाव से सिर नाय पं० लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पं० लेखराम ॥ १ ॥
(पण्डितजी का धार्मिक वीरों की प्रणाली से उत्तेजित होना)
धर्मधारी वीर वैरी से कभी डरते नहीं।
पुण्य के प्रतिकूल पूजा पाप की करते नहीं ॥
तामसी मत मान, मन में मोह को भरते नहीं।
जालिमों को जन्म लेने के लिए मरते नहीं ॥
बस इसी उद्देश्य को उर लाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ २॥
(पण्डितजी का महामन्तव्य)
आलसी के ठौर ठाली, साहसी सोते नहीं।
मूड़ मण्डल के विवेकी, काल को खोते नहीं ॥
भोगियों की भाँति, योगी रात दिन रोते नहीं।
कायरों के पक्षपाती सूरमा होते नहीं ॥
इस महामन्तव्य का फल पाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ २ ॥
(पण्डितजी की योग्यता और कर्तव्यपालन)
बन गये विद्याविशारद धर्म का धन जोड़कर।
योग का आनन्द लूटा योगियों की होड़कर ॥
मेल का मेला लगाया फूट का शिर फोड़कर।
खुले पड़े परतन्त्रता के बन्धनों को तोड़कर ॥
श्री दयानन्दर्षि के गहि पांय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ४ ॥
(धर्मवीर का धर्मोपदेश)
वेद का उपदेश देते देश में फिरने लगे।
दम्भ सारे दुर्दशा के घेर में घिरने लगे ॥
लेख मन माने मतों पर वज्र से गिरने लगे।
झक्कड़ों के झुण्ड चारों ओर को चिरने लगे।
जाल ग्रन्थों में लगा लिपि लाय पण्डित लेखराम ॥ ५ ॥
(वेद-विरोधी ग्रन्थों का खण्डन)
पोल खुलते ही पुराणों का महातम हट गया।
बुद्धि की विधि बँध गई मद जैनमत का घट गया ॥
जी जला इञ्जील का, दिल बायबिल का फट गया।
दम घुटा तौरेत का छल-बल जबूर का कट गया ॥
पड़ गये मुसहफ के पीछे, धाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ६ ॥
(वेद और कुरआन का विरोध)
सामने कुरआन के ले वेद चारों अड़ गये।
मार मन्त्रों की पड़ी पर आयतों के झड़ गये ॥
डूबकर गहरे दलाइल में गपोड़े सड़ गये।
कुल हदीसों के हवाले भी भमर में पड़ गये ॥
इस तरह इस्लाम का घर ढाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ७ ॥
(पण्डितजी के साथ मुसलमानों का विश्वासघात)
चिढ़ गये वैदिक बटोही से मियाँ सब हार कर।
चल पड़े अपनी पुरानी चाल पै तकरार कर ॥
एक पाजी आ मिला मत वेद का स्वीकार कर।
अन्त में भागा कलेजे में कटारी मार कर ॥
नीच को अपनाय धोखा खाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ८ ॥
(पण्डितजी का वैदिक बलिदान)
केशरी पर घात गीदड़ की अचानक चल गई।
कामना विश्वासघाती खर्व खल की फल गई ॥
नाम को इस्लाम के शिर से बला-सी टल गई।
आग इस ज्वालामुखी छल की जगत् में जल गई ॥
बन गये बलिदान दल के राय पण्डित लेखराम।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ९ ॥
(पण्डितजी की परलोक यात्रा)
क्या चिकित्सा की चली उर शूल से गढ़ते रहे।
प्राण तन को त्यागने की चाल पै चलते रहे ॥
प्रेमपूरित शब्द मुख से अन्त लों बढ़ते रहे।
धर्म को धर ध्यान में गुरु-मन्त्र को पढ़ते रहे ॥
चल बसे परलोक में तज काय पण्डित लेखराम।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १० ॥
(पण्डितजी की अन्तिम शिक्षा)
धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नहीं।
चेतकर चलना कुमारग में कदम रखना नहीं ॥
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नहीं।
बोध-वर्द्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ॥
दे परे हमको मुनासिब राय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ ११ ॥
(पण्डितजी के शोक में माता आदि का रोना)
हो निपूती माँ प्रतापी पुत्र को रोने लगी।
धर्मपत्नी प्राण प्राणाधार पर खोने लगी ॥
शोक से सब साथियों की दुर्दशा होने लगी।
मौह-माया वेदना के बीज यों बोने लगी ॥
हाय बेटा हाय स्वामी हाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १२ ॥
(पुरवासियों का रोना)
आ पुकारे लोग प्यारे कल्पभर को मर चले।
दीन भारतवर्ष को बलहीन व्याकुल कर चले ॥
धर्म कीरति की धरोहर-सी धरा पर धर चले।
ब्रह्मकुल के शुद्ध साँचे में चकाचक भर चले ॥
कर्म-काञ्चन तीव्र तप से ताय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १३ ॥
(पण्डितजी की महाशय्या)
वीर की अर्थी उठाकर दीन-दुःख पाते चले।
जी जले आँसू बहाते ठोकरें खाते चले ॥










