चाव में डूबे उमंगों में भर भावों ढले ।

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चाव में डूबे उमंगों में भर भावों ढले ।

चाव में डूबे उमंगों में भर भावों ढले ।
गान के वर गौरवों की भू बना अपने गले ॥
कौतुकों की मूर्त्तियाँ बनकर वितानों के तले।
भूति न्यारी भावुकों की भाल पर अपने मले ॥
जो परव त्योहार अपने हैं मनाते हो मगन।
हैं बड़े वे भागवाले हैं सदा वे धन्य जन ॥ १॥

हैं उठाते देश के नभ के अर्क वे आनन्द-घन।
वे प्रफुल्लित हैं बनाते जाति-जीवन का वदन ॥
वे दिखाते हैं परस्पर प्यार के सुन्दर सुमन।
हैं दिखाते खोलकर वे सभ्यता संचित रतन ॥
हैं बड़ी ही बुद्धि से त्योहार वसुधा में रचित ।
चारुता से वह विभव जातीय करते हैं विदित ॥ २ ॥

जब सजा नव पल्लवों के पुंज से विटपावली।
जब रसालों से लसाकर मञ्जरी सोने ढली ॥
जब बना छोटी बड़ी सब डालियाँ फूली-फलीं।
हाथ में ले जब अनूठे रंग की नाना कली ॥
विहँसता ऋतुराज आता है महा मोदों सना।
रञ्जिता आमोदिता आनन्दिता वसुधा बना ॥ ३ ॥

मत्त हो-होकर निकुंजों गूँजता है जब भ्रमर।
हैं सुनाती कूककर जब कोकिला स्वर्गीय स्वर ॥
बोल करके बोलियाँ मीठी रसीली मुग्ध कर।
जब विहगगन हैं दिशाओं को बनाते मंजुतर ॥
जब मलय मारुत बड़ी ही चारुता के साथ चल।
है बहा देता उरों में मत्तता धारा प्रबल ॥ ४ ॥

देख करके खेत को अपने-अपने सुअन्नों से भरा।
जब किसानों का हृदय-तल है बहुत होता हरा ॥
की गई थी जो कमाई पत्थरों का पो बरा।
जब सुफल उसको उन्हें है, मुग्ध हो देती धरा ॥
झौपड़ी से राजभवनों तक सुआशाएँ फला।
है विलसती दीखती सम्पन्नता की जब कला ॥५॥

तब उठेगी क्यों नहीं उर में विनोदों की लहर।
क्यों न जाएगा रुधिर में प्राणियों के ओज भर ॥
रंग लाएँगी उमंगें क्यों नहीं बन चारुतर ।
चौगुना हो चाव चित्तों में करेगा क्यों न घर ॥
फलस्वरूप इन्हीं सबों का पर्व होली है बना।
जो बड़ा ही है मनोहर मुग्धकर मन भावना ॥ ६ ॥

जिस दिवस को गात छू प्रह्लाद का पावन परम ।
होलिका का अग्निमय अङ्कम हुआ था पुष्पसम ॥
है यही फागुन सुदी पूनो दिवस वह मञ्जुतम ।
है इसी से हो गया त्योहार यह अधिकानुपम ॥
जिस दिवस को पुण्यजन की बात वसुधा में रही।
जाति जीति इस दिवस को मान देगी क्यों नहीं ॥ ७ ॥

धान्य कटने के समय सब देश का है यह चलन।
लोग कहते हैं विविध उत्सव बना उत्फुल्ल मन ॥
मान देते हैं बरस के आदि दिनों को सर्वजन।
है हुआ इस सूत्र से भी पर्व होली का सृजन ॥
हैं बड़े उत्साह से उनको मनाते निम्नजन।
हैं उसे कहते इसी से पर्व उनका विज्ञ जन ॥ ८ ॥

वृद्धि पाती है शिथिलता शीत की जब नित्य प्रति ।
पेड़ तक को है सरस करती किरण जब वार प्रति ॥
तब इधर है ओजमय होता रुधिर जो क्षिप्र गति ।
व्याधियाँ उत्पन्न होकर हैं उधर लातीं विपत्ति ॥
है इसी से यह व्यवस्था लोग हों उत्सव-निरत ।
चित्त रखें उत्फुल्ल, पहनें वर वसन हों मोदरत ॥ ९ ॥

यह बड़ा ही भावमय त्यौहार है जैसा मधुर।
वैसे ही है देशव्यापी औ विमोहक लोक उर ॥
दीखती है इस परव में मत्तता इतनी प्रचुर ।
है उमड़ पड़ता परम उससे नगर गृह ग्राम पुर ॥
इन दिनों उठती है उस आनन्द की उर में लहर।
चैरता जो है बरस दिन की मिटाता अंक भर ॥ १०॥

आज दिन रोते हुओं को लोग देते हैं हँसा।
मोद देते हैं व्यथामय मानसों में भी लसा ॥
जिन कुचालों में समाज विमोहवश है जा फँसा।
हैं विमूढ़ों को जगा देते उन्हें आँखों बसा ॥
स्वांग लाकर सैकड़ों नाना स्वरूपों को बना।
भावमय गीतादि से जातीय दोषों को जना ॥ ११ ॥

इन दिनों जैसा गमकता है मुरज बजता पनव।
वेणु वीणा आदि जैसा हैं सुनाते मंजु रव ॥
कण्ठ जैसा है दिखाता ओज या माधुर्य नव।
है स्वरों-जैसा विलसता चारुतर स्वारस्य जब ॥
सालभर ऐसा मनोहर रंग दरसाता नहीं।
है गगन रस-सा बरसता मोद सरसाती मही ॥ १२ ॥

हैं सरव होती रसीले कण्ठ से सड़कें सकल ।
चौहटों चौपाल में है नित्य होता गान कल ॥
है गली-कूँचों विचरता गायकों का मत्त दल।
झाँपड़े होते ध्वनित हैं गूंज उठते हैं महल ॥
स्वर सरसता है बड़ी सुकुमारता से सब समय।
पेड़ तक की डालियाँ होती हैं मंजुल नादमय ॥ १३ ॥

अङ्ग-बंग-कलिंग होते हैं प्रमोदों में निरत।
नाच उठता है सकल पंजाब हो आमोद रत ॥
यह हमारा युक्तप्रान्त प्रमत्त होता है महत् ।
है मनाता मोद राजस्थान हो उन्मत्तवत् ॥
डूब जाती है विनोदों बीच भारत की धरा।
व्रज उमड़ पड़ता है हो जाता है हरियाणा हरा ॥ १४॥

काल पाकर यह रुचिर त्यौहार भी कलुषित हुआ।
कसवियों का नाचना गाना अधिक प्रचलित हुआ ॥
गालियाँ बकना बहकना मद्यपान विहित हुआ।
डाल देना कीच कालिख पोतना समुचित हुआ ॥