अर्घा हिन्वा॒न इन्द्रियं ज्यायया॑ महि॒ित्वमा॑नशे । अ॒भि॒िष्टिकृद्विच॑र्षणिः
।। ऋः ६.४८.५
तर्जः माये विन नाहीं बाई
सूक्ष्म से सूक्ष्म ये जीव है अभंग
फिर भी शक्तियाँ अनेक और कई रंग॥
॥ सूक्ष्म से भी॥
प्रभु-महिमा देखो, जीव को दी इन्द्रियाँ (2)
दूर तक जो देखे सुने, हैं विचित्र शक्तियाँ (2)
जीव-इन्द्रियों का मेल (2) अद्भुत तारतम्य ।
॥सूक्ष्म से भी॥
इन्द्रियों का बलदाता है प्रभु महेन्द्र (2)
इन्द्रियों के द्वारा बना जीव ज्ञान-केन्द्र (2)
हर अभीष्ट तत्त्व में (2) जगत्पिता का प्रबन्ध
॥ सूक्ष्म से भी॥
यूँ तो सामान्य ज्ञान सभी जीवों को मिला है (2)
पर प्रभु प्रदत्त ज्ञान सत्य से तुला है।
है प्रभु सर्वज्ञ, चेतन (2) और गुण अनन्त ॥
॥ सूक्ष्म से भी॥
जैसी चाह वैसा कर्म जैसा कर्म वैसा फल (2)
अभीष्ट पदार्थों का वो कर्ता दाता अव्वल,
माँग लो अभीष्ट प्रभु से वो सर्वज्ञ अचण्ड॥
॥ सूक्ष्म से भी॥
सखा कभी ना सखा के वचनों को तोड़े (2)
सुभग सौभाग्यों को मित्रभाव से खोले (2)
विध्न विधातक मित्र होते दूर स्वयं।
॥ सूक्ष्म से भी॥
(अभंग) अटूट। (सर्वज्ञ) परमज्ञानवान। (तारतम्य) गुण आदि का परस्पर मेल। (अभीष्ट)
वांछित, मनोरथ। (प्रदत्त) दिया हुआ। (चेतन) चेतना युक्त। (अब्बल) सबसे श्रेष्ठ।
(अचण्ड) सुशील, सौम्य। (सुभग) मनोहर, आनन्ददायक। (विघातक) मारने वाला, घात करने वाला।










