अश्रद्धावान पिछड़ जाते हैं

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न्य॑क्रुतून ग्रूथिनौ मृध्रवा॑चः प॒णीर॑श्रुद्धाँ अ॑वृधाँ अ॑य॒ज्ञान ।

प्रप् तान् दस्यूँरग्निर्विवाय॒ पूर्वश्चकारापरौं अय॑ज्यून।। ऋः ७.६.३

तर्जः माणिक्ये पुईलेनी काणात काडुम्बो

धर्म और कर्म विहीन, ना फूलते फलते
ध्यान उपासना धर्म कर्म के फल फलते
धर्म और…

हैं जो अश्रद्धालु जन चाहे तो थोड़े दिन
आनन्द मौज करें, हो जाते फिर अनमन
स्थाई, रूप से कभी होते ना समृद्धशाली बुरे कर्म अखड़ते ॥
धर्म और

जो हैं श्रद्धालु जन, समझो के थोड़े दिन
हो जायें कुछ कष्टापन्न कष्ट टले तो शमन
जीवन के कर्म की गति जागती जिसमें सुमति याज्ञिक श्रद्धा को वरें।
धर्म और…

माया के जाल में फँसे, हानि अन्यों की करते
क्रूर हिंसक वाणी लिए अन्याय अघ करते फिरते
वार उनका दोधारी खुद बढ़ें औरों पे भारी मैं ही मैं लिए मरते॥
धर्म और…

उपक्षय घात व हिंसा, दुर्लक्ष्य उनके यही
झूठ से होता दिन शुरू, मानते सत्य को नहीं,
एक दिन वो भी आता, खुलता पाप का खाता औंधे मुँह गिरते॥
धर्म और…

ऐ प्यारे श्रद्धावानों अग्नि प्रभु को मानों
कर्म करो सारे याज्ञिक, श्रद्धा को विनय में ढालो
धर्म-कर्म में रुचि, करो आत्म-मन शुचि प्रभु के बनके रहें।॥
धर्म और