तच्चक्षुदे॒ववर्हितं पुरस्तांच्छुक्रमुच्चरत।
पश्येम शरदः शतं जीवैम शरदः शृत शृणुयाम ।
1 शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः
स्याम शरदः शतं भूय॑श्च शरद॑ः श्रुतां ॥२४
॥ यजुः ३६/२४ ऋ.७.६६.१६
तर्जः मलमली तारुण्य माझे तू पहाटे
जग की आँख है अंशुमाली, शुक्र ज्योति में विभासे (2)
ज्योति बन के हित करे प्रभु (2) प्रेरणाओं से जगाते॥
॥ जग की॥
निज प्रकाश से सर्वजगत को देता दर्शन-शक्ति वो (2)
वो है परम विशुद्ध चक्षु, आदिकाल से सदा प्रभासे।
॥ जग की ॥
हित करे उन मानवों का, जिनमें देव स्वभाव उत्तम (2)
ज्ञान और विज्ञान देकर, निज प्रकाश में ढालते॥
॥ जग की॥
आओ अन्तर्नेत्रों से इस सूर्य को अनुभव करें (2)
दिव्य सूर्य का ज्ञान ले हम सौ बरस जीया करें।॥
॥ जग की॥
सौ बरस तक प्रभु-कृपा से प्राणों को धारण करें
सौ बरस तक आचरण हों शुद्धतम व्यवहार के॥ (2)
॥ जग की॥
आत्मदृष्टा के ही सम्मुख सौ बरस जीवें सुनें (2)
सौ बरस होवे प्रवचन, हों अदीन हर प्रकार से।
॥ जग की॥
हो सबल यदि देह आत्मा, आयु सौ से अधिक जियें (2)
देख सुन बोलें जियें हम, हों वित्तपति प्रयास से॥
॥ जग की ॥
(अंशुमाली) सूर्य। (शुक्रज्योति) अग्नि स्वरूप ज्योति। (विभास) चमक। (अदीन) धनी, उदार, दीनता रहित। (वित्तपति) कुबेर।










