त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र संतस्थाना विह्वयन्ते समीके।
अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नासुन्वता सख्यं वष्टि शूरः
॥ ऋ. १०.४२.४ अथ: २०/८६/४
तर्जः मयसुन्नदी उन्नदी मिट्टन मुक्ती मुट्ठ
मन उन्नत्ति करके रह सुधी
बरसेगी प्रभु-कृपा
निज आत्म त्याग से ही
खुद को पराक्रमी बना।
चल के सत्य पथ पे
शुभ कर्म कमा
मित्रता इन्द्र की पा ले
वो ही हैं सखा
॥ मन कर उन्नति ॥
सिर्फ सत्य को रटना, लक्ष्य तक ना पहुँचाना
कह दो इसका लाभ है क्या, ये समझाना
हाथ में हवि को लेकर, उसे त्याग-रूप देकर
सत्यरूप का तुम भी ले लो नशा
सत्य हेतु नित प्रति दिन बाँधे रखता है कफन
जीवन के अंत तक जो करता है सत्य सवन
उसने ही जीवन को रसमय विधि से जीया॥
॥ मन कर उन्नति ॥
इन्द्र की जो मित्रता चाहो तो हविष्यमान हो जाओ
हविष्यमान हो के करो सोम सवन
विचर के ना सत्य में, जिन्हें ढोंग करना है
उनका छोड़ दो संग, ना करो स्मरण
सत्य का रस पाने की जिसमें क्षरित क्षमता है
सचमुच इन्द्र से परम सौभाग्य उनको मिलता है।
ना असत्य पे अड़ो।
सत्य में ही है भला ॥
॥ मन कर उन्नति ॥
(सुधी) बुद्धिमान। (हविष्यमान) उत्तम सामर्थ्यवान। (क्षारित) बहते रहना। (सवन) यज्ञ।










