धनी दरिद्र दोनों उसके याचक

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अ॒स्य शासु॑रुभयया॑सः सचन्ते ह॒विष्म॑न्त उ॒शिजो ये च॒ मर्ताः।

दि॒वश्च त्पूर्वो न्य॑सादि॒ होतापृच्छययो॑ वि॒श्वपति॑वि॒क्षु वे॒धाः ॥ ऋ. १.६०.२

तर्जः मन्दार पू मूली कादिल तईमासम वन्नल्लो

संसार में नहीं कोई धनवान, तृप्त तृष्णा से जो होय
होते हुए भी मालोमिल्कत अतिरिक्त लालसा होय
अपने से ज्यादा धनी, देख जलते, ईश्वर से धनों की याचना करते
और उससे माँगने में लाज ना कोय ॥ संसार में॥

जितना बिछ गया लालसा का जाल, उतना ही समझो वो कंगाल
धनी हो, हो दरिद्र, त्यागी या कामी, सबको देता वो ही स्वामी
त्यागी धनी दरिद्र, या कामी जो भी चाहे
देता है जगदीश्वर, सबका सौभाग्य बनाये
सबका अधिपति और अधिष्ठाता
एक मात्र ईश्वर है उसके बिना ना कोय॥ ॥ संसार में ॥

जिससे सब पदार्थ उत्पन्न होते, उत्पन्न होकर जिसमें हैं जीते
मर के भी फिर कहाँ किसमें जाते, यही तो सबको वेद बताते
इसको जानना ही वही ज्ञान ब्रह्म है
राजा है वो अनादि लेता ना जन्म है
सृष्टि सूर्य से पहले है ईश्वर
जीवों में परमाणुओं में नित्य ही होय ॥
॥ संसार में॥

प्रभु तू विद्यमान है जब नित्य, देने का तुझमें है औचित्य
हर कोई तुझसे हर पल माँगते, और हमारी सुध तुम ले लेते
देदे हमको स्वामी तू सबसे ज्येष्ठ है
जिस धन को तुम मानो के सर्वश्रेष्ठ है
पूजित धन से भर दे झोली
बैठे चरणों में कब से आस संजोय ॥ संसार में॥

(औचित्य) सच्चाई, उपयुक्तता। (ज्येष्ठ) बड़ा। (अधिष्ठाता) किसी कार्य का निरीक्षण करने वाला,
राजा ईश्वर।