अति निहो अति सृधोत्यचित्तिरति द्विषः ।
विश्वा ह्युऽग्ने दुरिता तर॒ त्वमया॒स्मभ्यसहवीरं र॒यिं दाः
॥ अथर्व. २.६.५
तर्जः मनसी मनसी कुयता मिन्मे
बनते बनते बात बिगड़ती आता स्वार्थ जब मन में
किन्तु पाके प्रभु-शरण तब मन जाता है सद्गुण में
सद्गुण ने ही सूचात्मा को डाला ईश के अनुगुण में
फैलाता मन सद्गुणों को प्रेम श्रद्धा से जन जन में॥
॥ बनते, बनते बनते॥
हम विषय भोगों में फँसे हैं, जिसने हमें विनष्ट किया है
इन दुरिष्ठ-दुरितों से बचाओ, तुझको अपना आपा दिया है
असत् अनत अरस अनय इन दुर्गुणों से बचा
विदुर विनत विपुल विमल विद्रात्मा में सजा
शनैः-शनैः शुभप्रद बनें।
॥ बनते, बनते बनते।
अनगिनत कामादि बढ़ाये रोग शारीरिक हमको सताये,
हो रहे कर्तव्य विमुख, हम क्यों न अविद्या हर ली जाये?
क्यों पिण्ड नहीं छोड़ते ये द्वेष, भाई को भाई लड़ाये
ये आपका पुनीत जगत, दूषित हम करते आये
उच्छिष्ट तजें, उत्कृष्ट बनें।
॥ बनते, बनते बनते॥
दुर्व्यसन दुष्कर्म दुराग्रह कब से मन में घर बनाये
इन्हें बेघर करो प्रभु शुद्ध आचरण ही मन को भाये
पावक प्रतिभा बनाओ ऐश्वर्य ऐसे दिलाओ
दूषित बने ना आत्मा सन्मार्ग-साधक बनाओ
सुनो प्रार्थना, हे कृपानिधे ! ॥ बनते, बनते बनते ॥
हम नहीं चाहें के अकेले ऐश्वर्य अधिकारी बने
वीर, कुटुम्ब समाज राष्ट्रजन सब इसमें सहभागी बने
रहे सुखद ये सारा विश्व मिल-जुल हाथ बटाये
मधुर-मञ्जुल मिलें ये मन, प्रेम संदेश फैलायें।
मिल के चलें संगठन बनायें।॥
॥ बनते, बनते बनते ॥
(सूचात्मा) पवित्र आत्मा। (अनुगुण) समान गुण वाला। (दुरिष्ठ)
निकृष्ठ। (दुरित) पाप, दुष्कर्म। (प्रतिभा) चातुर्य। (मञ्जुल) सुन्दर प्यारी।
(असत्) झूठा। (अनत) घमंडी। (अरस) रसहीन। (अनय) दुराचरण। (उच्छिष्ट)
अपवित्र। (विदुर) बुद्धिमान, पण्डित। (विनत) विनम्र, झुका हुआ। (विपुल)
विशाल, विस्तृत। (विमल) शुद्ध, पवित्र।










