न मैं धाम धरती, न धन चाहता हूँ।
न मैं धाम धरती,
न धन चाहता हूँ।
कृपा का तेरी एक,
कण चाहता हूँ।
रटे नाम तेरा वह,
चाहूँ मैं रसना।
सुने यश तेरा,
वह श्रवण चाहता हूँ।।१।।
विमल ज्ञान धारा से,
मस्तिष्क उर्वर।
वह श्रद्धा से भरपूर,
मन चाहता हूँ।।२।।
करें दिव्यदर्शन,
तेरा जो निरन्तर ।
वही भाग्यशाली,
नयन चाहता हूँ।।३।।
नहीं चाहना है मुझे
स्वर्ण छवि की।
मैं केवल तुम्हें,
प्राण धन चाहता हूँ।।४।।
प्रकाश आत्मा में,
आलोक तेरा हो।
परम ज्योति प्रत्येक,
क्षण चाहता हूँ।।५।।










