पंडित तुलसीराम

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पंडित तुलसीराम: सत्य के यज्ञ में आहुति देने वाला एक आर्य योद्धा

उनका वध उन लोगों ने किया, जो ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की दुंदुभि बजाते हैं; जो भगवान महावीर को अपना आचार्य मानते हैं; जो सूक्ष्मतम हिंसा से भी बचने की शिक्षा देते हैं। फिर भी, उन्होंने एक निर्दोष, शांतिप्रिय और सत्यप्रचारक की हत्या करके अपने सिद्धांतों का घोर उल्लंघन किया। प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच उनकी पीड़ा समाप्त हो गई?

जन्म एवं बाल्यकाल:

पंडित तुलसीराम का जन्म पंजाब प्रांत के गुरुदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक के समीप स्थित रुड़ा ग्राम में हुआ था। वे पवित्र ब्राह्मण वंश के पुरुष थे। उनके पिता श्री हरिराम एक प्रतिष्ठित साहूकार थे। उनका परिवार सादगीपूर्ण था – दो छोटे भाई और एक बहन लक्ष्मीदेवी। दुर्भाग्यवश, बाल्यकाल में ही माता का साया सिर से उठ गया और बारह वर्ष की अवस्था में पिता का देहांत हो गया।

शिक्षा एवं प्रारंभिक जीवन:

गुरुदासपुर के गवर्नमेंट हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत वे रुड़की ओवरसियर क्लास में अध्ययन हेतु गए, परंतु बीमारी के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तत्पश्चात उन्होंने रेलवे सेवा में प्रवेश किया और लोधरा स्टेशन पर कार्य प्रारंभ किया।

गृहस्थ जीवन:

बटाला में श्रीमती लाजवंती देवी से उनका विवाह हुआ। रेलवे सेवा के अंतर्गत उन्होंने रसीदा, मुलतान, पत्तोकी, मुरीदके, शोरकोट रोड, दाउदसेल और फरीदकोट जैसे विभिन्न स्टेशनों पर कार्य किया।

आर्य समाज से जुड़ाव:

आर्य समाज का संस्कार उन्हें गुरुदासपुर में मास्टर मुरलीधर जी से मिला। इसके पश्चात उन्होंने प्रत्येक स्थान पर आर्य समाज का प्रचार-प्रसार किया। जहाँ समाज की शाखा नहीं होती, वहाँ स्थापना करते और जहाँ होती, वहाँ उसकी उन्नति में यथाशक्ति योगदान देते।

वे एक उत्कृष्ट गायक भी थे, और अपनी मधुर वाणी एवं सितार वादन द्वारा श्रोताओं को प्रभावित करते थे। यह संगीत उनके प्रचार का साधन बन गया। फरीदकोट में उनका सितार अब भी उनके घर में रखा हुआ है।

धर्मप्रचार एवं विरोध:

सनावा और आसपास के ग्रामों में उन्होंने नशा, मांसाहार और मूर्तिपूजा के विरुद्ध प्रचार किया। चौधरी रत्नचन्द जैसे कई स्थानीय लोग उनके भक्त बन गए। वे अपने घर पर अतिथियों का स्वागत बड़े आदर से करते थे। पंडित लेखराम जी भी उनके घर पर अतिथि रह चुके थे।

शहीदी और षड्यंत्र:

सन् 1903 में जब वे फरीदकोट स्टेशन पर थे, जैन समाज के कुछ असहिष्णु तत्वों ने, जो उनकी धार्मिक विचारधारा से चिढ़ते थे, उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचा। गोपीराम नामक एक कर्मचारी, जिसे उन्होंने ड्यूटी में अनुशासनहीनता के लिए डांटा था, इस षड्यंत्र में शामिल हुआ।

एक शनिवार की रात, जब वे सितार बजाते हुए नगर में प्रचार कर रहे थे, अंधेरे में किसी ने उनकी आँखों में मिर्च-मिश्रित रेत झोंक दी और फिर छुरा घोंप कर भाग गया। घायल अवस्था में वे किसी प्रकार स्टेशन पहुँचे और वहाँ से फिरोजपुर लाए गए। दुर्भाग्यवश, चिकित्सा में लापरवाही हुई और उनकी धर्मपत्नी लाजवंती देवी अस्पताल का पता न जानने के कारण भटकती रहीं।

महान अंत:

मरते समय उन्होंने कहा – “बिना अपराध के मारा गया। अच्छा, धर्म के मार्ग पर प्राण दिया।”
सोमवार की शाम साढ़े पाँच बजे उनका देहांत हो गया।

उनकी आयु मात्र 32 वर्ष थी। वे उच्च आदर्शों से युक्त, निष्कलंक, दीर्घाकार, आकर्षक व्यक्तित्व वाले, धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। जब घायलावस्था में उन्हें ब्रांडी दी गई, तो उन्होंने कह दिया – “प्राण दे सकता हूँ, शराब नहीं पी सकता।”

निष्कलंक जीवन:

नौ वर्षों की नौकरी में उन्होंने कभी रिश्वत नहीं ली। मृत्यु के समय उनकी कुल पूँजी केवल एक हज़ार रुपये थी। उनकी दो पुत्रियाँ जीवित थीं।