भारत, गारत, ये क्यूँ हो गया।
भारत, गारत, ये क्यूँ हो गया।
स्वाभिमान, इसका, कहाँ खो गया।
धरती ये पावन है राम की,
है जन्मभूमि ये घनश्याम की
निसदिन होते थे सध्या हवन,
होती थी बातें बड़े काम की
मगर कौन कांटे यहाँ बो गया,
स्वाभिमान, इसका कहाँ खो गया भारत……
महफिल में ये गीत जो गायेगा,
गाने से पहले वो शर्मायेगा
मेरी नज़र में सचिन “सारंग”,
वो ही श्रेष्ठ गायक कहलायेगा
ना वापस आये पल गुज़र
जो गया स्वाभिमान,
इसका कहाँ खो गया भारत……
दर्जा था नारी का ऊँचा यहाँ,
कहते थे मातृशक्ति इन्हें मगर आ
कोठों पे बिकती हुयी,
देखा गया है सिसकती
इन्हें कहानी को लिखते
कलम रो गया स्वाभिमान,
इसका कहाँ खो गया भारत……
इज्ज़त को बाज़ार में बेचकर,
भारत की नारी ये खुश हो रही
अय्याशों के साथ में घूमकर,
जीवन को अपने यूंही खो रही
मजबूर होकर धर्म सो गया स्वाभिमान,
इसका कहाँ खो गया भारत……









