मैं शरण तेरी प्रभु आ पड़ा, मुझे अपना ज्ञान प्रकाश दे

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मैं शरण तेरी प्रभु आ पड़ा, मुझे अपना ज्ञान प्रकाश दे

जितने हों क्षण तेरी शरण, उतने ही मुझे प्रभु श्वास दे ॥ मैं शरण…

कई जन्मों से खोया अमन, ना कभी खिला हृदय चमन

मैं बहुत सता हूँ ऐ भगवान मुझे फिर ना जग की तू आस दे ॥ मैं शरण..

संसार में भटके कदम, जब होश आया समय था कम

प्रभु बाँह थामो इसी जन्म, मुझे तेरा प्रेम प्रसाद दे ॥ मैं शरण…

तू जो पास, दूर हैं जग बन्धन, रहा दूर तुझसे तो है पतन

कहीं पापों में भटके ना मन, संयम का इसे अभ्यास दे ॥ मैं शरण…

अल्पज्ञ मैं सर्वज्ञ तुम, मेरे मन की पहुँच हुई अगम

और आहुति भक्ति की कम, कुछ भी तो प्रेम का लाभ दे ॥ मैं शरण..

तेरी शक्ति के आगे नमन, मैं क्या हूँ तुच्छ मेरा अहम

तेरी चरण धूल का छोटा कण, तेरे चरणों में आवास दे ॥ मैं शरण…

तेरे अदितीरूप का हो चिन्तन, मेरी नम्रता हो तेरे चरण

हे सविता देव, प्रकाशमन, तू ‘ललित’ को तव विश्वास दे ॥ मैं शरण…

(सवितादेव) जगदुत्पादक, परमेश्वर (आदिती रूप) अखण्ड स्वरूप अग्नि (सर्वज्ञ) क्रान्तदर्शी

तर्ज: जो थके थके से थे हीसले (मेहन्दी हसन)