जैसा खाये अन्न बेटी वैसा होवे मन।

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जैसा खाये अन्न बेटी वैसा होवे मन।

जैसा खाये अन्न, बेटी वैसा होवे मन।
जैसा पीये पानी, वैसी बोलता है वाणी।।

पापी का आतिथ्य ग्रहण करने से
आत्मिक बल घट जा स्वाभिमान
खत्म होने से जीवन सारा चौपट जा।
ऋषियों का कथन बेटी है
यह सत्य वचन, यह शिक्षा ना मानी,
भारी कर बैठा नादानी । ।1।।

आश्चर्य होना स्वाभाविक
मेरी तकरीरों से,
मेरे पापों का प्रायश्चित है
अर्जुन के तीरों से।

छलनी हो रहा तन बेटी
कर रहा कष्ट सहन,
यह अन्तिम अन्दगानी,
मुझको सफल बनानी। ।2।।

घावों की पीड़ायें सह करके
दूषित मन शुद्ध हुआ,
इसीलिये मन वचन कर्म से
मैं पापों के विरूद्ध हुआ।

धर्म का मर्म गहन बेटी कर
रहा हूँ वरनन,
दुनियां आनी जानी,
यहाँ कोई सदा रहानी।।3।।

एक मरन मर ने वाले को
जिन्दा कर जाता है,
एक जिन्दगी जीने वाला
जिन्दा मर जाता है।

सत्य धर्म आचरण बेटी
जीवन है जीवन,
जिसमें नहीं रवानी है
प्रेमी क्या जिन्दगानी।।4