ये मानस तन अनमोल रतन

0
63

ये मानस तन अनमोल रतन

ये मानस तन अनमोल रतन,
क्यों वृथा रहा गंवाई हो पति..
मानस देह मिले ना सदा।

तू ओ३म् नाम को भूल गया
हुक्के से प्रीत लगाई हो पति…5

नित्य कर्म हवन सन्ध्या छोड़ा
हुक्के की करे सफाई हो पत्ति….

अपना दातुन कुल्ला छोड़ा
तैने हुक्के की करवाई हो पति..

तू लिए चिलम घर-घर डोलै
क्यों लाज शर्म न आई हो पति…

बण चोर बिटोडे पाड़ रहा दे
रही है गाल लुगाई हो पति
तेरे मुँह में बदबू आवै क्यों
मुंडी मूंछ बनाई हो पति…

तेरा धर्म बिगाड़ा हुक्कै नै
दुनिया की झूठ खवाई हो पति…

तेरी मेरी चुगली करना इस हुक्कै
ने सिखलाई हो पत्ति…

चोरी करना झूठा खाना
और बोलनी झूठ बताई हो पति..

किया तन-मन-धन का नाश
और सत्संग से प्रीत हटाई हो पति

तनै हवा बिगाड़ी धूमे से घर
में बदबू फैलाई हो पति…

कहीं गाड़ी बैल पैर फूंके
जगह-जगह आग लगाई हो पति…

तू अगले जन्म में सूअर बने
पद्मपुराण सुनाई हो पति…

तनै ‘नित्यानन्द’ की मानी
ना रहे बार-बार समझाई हो पति