वेदों का डंका आलम में बजवा दिया ऋषि दयानन्द ने।
वेदों का डंका आलम में
बजवा दिया ऋषि दयानन्द ने।
हर जगह ओम् का झण्डा
फिर फहरा दिया ऋषि दयानन्द ने।
बलिदान किया बलिवेदी पर
जीवन ‘प्रकाश’ हँसते-हँसते।
सच्चे रहबर बनकर सबको
चेता दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
अज्ञान, अविद्या की हरसूं
घनघोर घटाएं छाई थीं।
कर नष्ट उन्हें जग में प्रकाश
फैला दिया ऋषि दयानन्द ने
वेर्दो का…।
सर पर तूफान बला का था,
नजरों से दूर किनारा था।
बनकर मल्लाह किनारे पर
पहुंचा दिया ऋषि दयानन्द ने-
वेदों का…।
घुस गए लुटेरे घर में थे,
सब माल लूटकर ले जाते थे।
सोने वालों को हाथ पकड़
बिठला दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
मक्कारी दगा फरेबों से
जो माल मुफ्त का खाते थे।
सब पोल खोलकर दिल उनका
दहला दिया ऋषि दयानन्द ने-
वेदों का…।
उड़ गए होश मतवालों के,
मैदान छोड़कर भाग गए।
हथियार तर्क का निकाल
जब चमका दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
कब्रों में सर को पटकते थे,
दौड़े-दौड़े जो फिरते थे।
दे ज्ञान उन्हें मुक्ति का मार्ग
बतला दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
करते थे हमेशा चीख-चीख
तौहीन जो पावन वेदों की।
सर उनका वेदों के आगे
झुकवा दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
सब छोड़ चुके थे धर्म कर्म
गौरव गुमान ऋषि-मुनियों का।
फिर सन्ध्या-हवन यज्ञ करना
सिखला दिया ऋषि दयानन्द ने
वेदों का…।
विद्यालय गुरुकुल खुलवाए
कायम हर जगह समाज किए।
आदर्श पुरातन शिक्षा का
बतला दिया ऋषि दयानन्द ने-
वेदों का…।










