ओ३म् की महिमा

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🌷ओ३म् की महिमा🌷
वेद ने भी और उपनिषदों ने भी ‘ओ३म्’ द्वारा प्रभु दर्शन का आदेश दिया है।
यजुर्वेद में कहा है-
ओ३म् क्रतो स्मर ।।-(यजु० ४०/१५)
“हे कर्मशील ! ‘ओ३म् का स्मरण कर।”
यजुर्वेद के दूसरे ही अध्याय में यह आज्ञा है-
ओ३म् प्रतिष्ठ ।।-(यजु० २/१३)
” ‘ओ३म्’ में विश्वास-आस्था रख !”
गोपथ ब्राह्मण में आता है-
आत्मभैषज्यमात्मकैवल्यमोंकारः ।।-(कण्डिका ३०)
“ओंकार आत्मा की चिकित्सा है और आत्मा को मुक्ति देने वाला है।”
माण्डूक्योपनिषद् का पहला ही आदेश यह है-
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम् ।
भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।। १।।
“यह ‘ओ३म्’ अक्षर क्षीण न होने वाला अविनाशी है,यह सम्पूर्ण भूत,वर्तमान और भविष्यत् ओंकार का व्याख्यान् है।सभी कुछ ओंकार में है।”
अर्थात् ओंकार से बाहर कुछ नहीं,कुछ भी नहीं।
छान्दोग्योपनिषद् का ऋषि कहता है-
ओ३म् इत्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ।
“मनुष्य ‘ओ३म्’ इस अक्षर को उद्गीथ समझकर उपासना करे।”
‘योगदर्शन’ समाधिपाद में ‘ओ३म्’ का जप और उसके अर्थों का चिन्तन करने का आदेश दिया है इसके साथ ही योग-साधना में जो विघ्न आकर खड़े होते हैं,उनको दूर करने का यह उपाय बताया है-
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ।। ३२ ।।
“उन (विक्षेप-विघ्नों) को दूर करने के लिए एक तत्त्व (ओ३म्) का अभ्यास करना चाहिए।”

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