मधुर वेद वाणी

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या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्य‌त उरूची |तयेह विश्वाँ अवसे यजत्राना सादय पापया चा मधूनि ||

ऋग्वेद 3|57|5

शब्दार्थ

अग्ने…………पुरोहित

या……………जो

ते…………….तेरी

मधुमति……….मीठी

सुमेधा:………..उत्तम मेधायुक्त अर्थात सुबुद्धिपूर्वक

उरूची…………विशाल अर्थों का ज्ञान कराने वाली

जिह्वा………… वाणी

देवेषु………….देवौं में, विद्वानो में

उच्यते…………कही जाती है, प्रसिद्ध है

तया………….उसके द्वारा

अवसे…………प्रीति के लिए, प्रयोजन सिद्धि के लिए

विश्वाऩ्………..सब

यजत्राऩ्……….याज्ञिकों को

इह…………..यहाँ

आ+सादय……..ला बिठा और‌

मधूनि…………मधुर पदार्थ

पायल…………पिला |

व्याख्या

बहुत से लोग एक विशेष समुदाय के साथ मधुरता का व्यवहार करते हैं | वेद संकेत कर रहा है कि भाई! तू सबके साथ मीठी वाणी बोल | ऋषि ने इसी का अनुकरण करते हुए कहा है -सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए

अथर्ववेद 16/2/2 में कहा है

मधुमतीस्थ मधुमतीं वाचमुदेयम्

हे प्रजाओ! तुम मिठासयुक्त होओ, मैं मिठासयुक्त वाणी बोलूँ अर्थात जो चाहता है कि लोग उसके साथ मीठा व्यवहार करें, उसे दूसरों के साथ स्वयं मीठा व्यवहार करना चाहिए । भ‌गवान ने उपदेश किया है कि सृष्टि के सारे पदार्थ मधुरता का व्यवहार कर रहे हैं, तू भी मधुरता का व्यवहार कर ।

देखिए, कितने मधुरमान्=मधुर हैं ये मन्त्र !

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः | माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ||…..ऋग्वेद‌ 1/90/6

सृष्टि नियम की अनुकूलता से चलनेवाले के लिए वायु मिठास लाती है, नदियाँ मिठास बहाती हैं, औषधियाँ हमारे लिए मीठी हों ।

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः | मधु द्यौरस्तु नः पिता ||…….ऋग्वेद‌ 1/90/7

रात मीठी है, प्रभात मीठे हैं, पृथिवी की धूलि या पृथिवीलोक भी मीठा है, पिता द्यौ भी हमारे लिए मधुर हो ।

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः | माध्वीर्गावो भवन्तु नः ||..….ऋग्वेद‌ 1/90/8

वनस्पति हमारे लिए मीठी हो, सूर्य्य भी हमारे लिए मधुमान् हो । हमारी गौवें माध्वी=मिठासवाली होंवे । यह सब मिठास ऋतानुसारी के लिए है । ऋत कहते हैं सरल सीधे, सृष्टिनियमानुकूल व्यवहार को । प्रकृत मन्त्र में वाणी को मधुमती के साथ सुमेधाः भी कहा गया है ।मीठा बोलो, किन्तु बुद्धि के साथ बोलो । बुद्धिरहित मीठा भाषण किस काम का । मीठे वचन को बुद्धियुक्त कहने का प्रयोजन है, यदि वक्ता में बुद्धि हो, तो वह अप्रिय सत्य को भी प्रिय बना लेगा ।

स्मृतिकार कहते हैं

सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् |

सच बोले, किन्तु अप्रिय‌ सत्य न बोले । बड़ी उलझन है । क्या चुप रहा जाए ? नहीं.

यही मनु महाराज कहते हैं

मौनात्सत्यं विशिष्यते

-चुप रहने से सत्य बोलना अच्छा है ।

वेद भी यही कहता है –

वदन् ब्रह्माSवदतो वनीयान्

-बोलनेवाला ज्ञानी न बोलने वाले से अधिक पूज्य है, अर्थात सत्य तो अवष्य बोलना है, चुप नहीं रहना । हाँ उसे अप्रिय भी नहीं रहने दें । प्रिय बनाने के लिए बुद्धि चाहिए ।

इसी कारण वेद ने कहाया

ते जिह्वा मधुमती सुमेधाः –

जो तेरी मीठी सुबुद्धियुक्त वाणी है, उस सुबुद्धियुक्त वाणी से सब जनो को इकट्ठा कर और मिठास पिला । सबसे मीठा वेद है, उन्हे वह पिला । बता, तू वेद का मधुरपान दूसरों को पिलाता है ? या नहीं पिलाता, अब तो पिला । वेद बहुत मीठा है । एक बार स्वयं पी, फिर तू बार बार पिएगा, और विवश होकर दूसरों को भी पिलाएगा ।

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