कैसी प्रभु तूने यह कायनात बांधी।

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कैसी प्रभु तूने यह कायनात बांधी।

कैसी प्रभु तूने यह
कायनात बांधी।

एक दिन के पीछे
एक रात बांधी
साथ-साथ बांधी
रजनी व्याहने चला
चांद दुल्हा बना,
साथ चन्द्रमा के तारों की

कभी थकते नहीं हैं ये घोड़े,
तूने सूरज के रथ में जो जोड़े।
बारात बांधी …….

कैसी खूबी से बांधे ये मौसम,
वर्षा सर्दी हेमन्त और ग्रीष्म।
ये बहार का शमा और
ये पतझड़ खिजां,
हवा बादलों के बीच
बरसात बांधी ………

पक्षी जलचर व जन्तु चौपाये,
तूने सबके हैं जोड़े बनाये।
नाग और नागनी राग और रागनी,
साथ स्त्री और पुरुष की भी जात
जात बांधी ……….

तू ही सबका पिता तूही मात है,
जो समझ में न आये तू वो बात है।
तेरी क्या बात है सौ की एक बात है
तूने हर बात में है कोई
बात बांधी…….

नत्थासिंह है अनन्त तेरी माया,
जग के कण-कण में तू है समाया।
जग से बाहर नहीं
फिर भी जाहिर नहीं,
अपने दामन में ऐसी
करामात बांधी…….