हाय हर्षाऊ,मैं तो झूम-झूम गाऊँ

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हाय हर्षाऊ,मैं तो झूम-झूम गाऊँ

हाय हर्षाऊ,
मैं तो झूम-झूम गाऊँ,
सारे जग को सुनाऊ ऐसे,
ऋषिवर की कहानियाँ,
गुरुवर की कहानियाँ।

ब्रह्मचारी की, तपधारी की,
जो हैं मेहरबानियाँ ॥ टेक ॥

ऐसे पर उपकारी को,
सारे जग हितकारी को।
‘कवि बेहोश’ नहीं जाना
सच्चे ईश पुजारी को।
दूध में जहर मिलाकर,
योगी को पिलाकर,
किन्हीं बड़ी नादानियाँ।

आई फागुन की शिवरात,
मूल ने किया उपवास।
शिव की प्रतिमा पै खास,
चूहा देखके हुआ उदास।
सोचा शिव है ये नकली
कोई और ही है असली,
झूठी पुजारियों को कहानियों।

वो संन्यासी अलबेला,
सदा रहता था अकेला।
संग चेली ना चेला,
एक था ईश्वर सहेला।
भटकता वन उपवन में,
कन्दरा गिरिगह्वर में,
सहता अनेकों परेशानियाँ।

पहुंचा विरजानन्द के पास,
हुई मन की पूरी आस।
करके वहाँ पर योगाभ्यास,
सच्चे शिव की की तलाश।
न तस्य प्रतिमा अस्ति,
वेद की बात है सच्ची,
झूठी पुराणों की कहानियाँ।

आज्ञा गुरु की सिर धार,
लाग्या करने को सुधार।
मथुरा काशी हरिद्वार,
किया वेदों का प्रचार ।
झूठे ठग पाखण्डी,
उठाकर झोला झण्डी,
भागे मिली ना निशानियाँ।

ऋषि था सर्वगुणों की खान,
वो था देवता महान् ।
बाँटा सबको वैदिक ज्ञान,
चाहा विश्व का कल्याण।
सत्यार्थप्रकाश बनाकर,
दूर भ्रमजाल हटाकर,
मेटी सारी परेशानियाँ।