ए दुनिया बता
ए दुनिया बता इससे बढ़कर
फिर और सदाकत क्या होगी।
जाँ दे दी तलाशे हक के लिए
फिर और अबादत क्या होगी।
यूँ तो हर रात की तारीकी
देती है पयाम उजाले का।
जिससे यह जहाँ पुर नूर रहे
उस रात की कीमत क्या होगी।
खंजर भी दिखाए अपनों ने
जहर भी पिलाये अपनों ने।
अपनों के ही एहसाँ क्या कम हैं
गैरों से शिकायत क्या होगी।
औरों के लिए मरने वाले
मरकर भी हमेशा जीते हैं।
जिस मौत पे दुनिया रश्क करे,
उस मौत की अजमत क्या होगी।
सदियों की खिजाँ के बाद खिला
इक फूल उसे भी तोड़ लिया।
कलियों के मसलने वालों से
फूलों की हिफाजत क्या होगी।
























