धैर्य, सहनशीलता

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🌷धैर्य, सहनशीलता🌷

**सहोऽसि सहो मयि धेहि।*―(यजु० 19/9)

हे ईश्वर ! (सहोऽसि) आप सहनशील हैं। (मयि) मुझ में (सहो) सहनशीलता (धेहि) प्रदान करो।धैर्य अथवा धृति का अर्थ है―दृढ़ता, स्थिरता, धारण करने की क्रिया, स्थिर सहने की क्रिया या भाव, ठहराव और मन की दृढ़ता आदि है। इन सब अर्थों का एक ही भाव है कि मन स्थिर और दृढ़ रहे। चाहे कैसी भी विपरित स्थिति हो, मन में किसी प्रकार का विकार न उठे। मन में किसी प्रकार की चंचलता न आए। मन में किसी प्रकार की उद्विग्नता और बेचैनी न हो। मन शान्त सरोवर की भाँति बना रहे।

मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण गिनाये हैं। उनमें धृति (धैर्य, धीरज) को धर्म का पहला लक्षण बताया है।*

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: ।**धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्ष्णम् ।*―(मनु० ६/९२)

श्रीकृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया तो अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, ‘जैसे आज निमिष मात्र ही में आपने इस दुष्ट को मृत्युदंड का पात्र मान लिया वैसे आप पहले भी मार सकते थे। वह तो सदैव आपका अपमान करता आया था।’श्रीकृष्ण ने आत्मस्थ गाम्भीर्य के साथ उत्तर दिया, ‘धनंजय, मैं तुम्हारा प्रश्न समझता हूँ। आज की तरह कभी भी मैं उसका संहार कर सकता था, किन्तु मेरे सम्मुख सदैव एक प्रश्न रहा है कि क्या बल का धर्म सदैव दण्ड देना ही है, क्षमा या सहन करना नहीं है? क्षमा तो बलवान ही कर सकता है, दुर्बल क्या क्षमा करेगा? सहन भी वही करेगा, जिसके पास सहनशक्ति होगी। अशक्त क्या सहन करेगा? अब तक मैं अपनी इन्हीं शक्तियों की परिक्षा कर रहा था। अपनी ही थाह ले रहा था कि मुझमें जो शक्ति है, वह कितनी मेरी है, क्योंकि शक्ति उतनी ही हमारी होती है, जिस पर हमारा, हमारे संकल्प का अंकुश रह सकता है।’

साभार-पंकज शाह

आर्य वीर एवं आर्य वीरांगना श्रेणी का प्रशिक्षण शिविर

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अपराजित वीर योद्धा संभाजी महाराज

http://aryasamaj.site/2023/03/11/aparajay-veer-yoddha-sambhaji-maharaj/

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