बुद्ध और ब्राह्मण

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बुद्ध

बुद्ध और ब्राह्मण आज बुध पूर्णिमा है। लोग इसे बुद्ध-पूर्णिमा बतला रहे हैं और गौतम बुद्ध जिनका जन्म लुम्बिनी में हुआ था, कुशीनगर में निर्वाण हुआ था उनके जन्म-ज्ञान-निर्वाण के साथ इस दिन को जोड़ कर मना रहे हैं, एक दूसरे को शुभकामनाएं भी दे रहे हैं । शुभकामनाएं देकर परोक्ष में बौद्ध-मत को पोषित कर रहे हैं जिसका कभी आदि-शंकराचार्य जी ने विरोध-खण्डन किया था। सच्चाई यह है कि यह दिन बुद्ध-पूर्णिमा नहीं है जबकि बुध-पूर्णिमा है । गौतम बुद्ध(सिद्धार्थ) के पूर्वज भी इस पूर्णिमा को मनाते थे जिसका नाम बुध-पूर्णिमा ही था ।” *बुध अवगमने* ” धातु से बुध शब्द सिद्ध होता है । ” *यो बुध्यते बोध्यते वा स बुध:* ” जो स्वयं बोध स्वरूप और सब जीवों के बोध का कारण है, इसलिए परमेश्वर का नाम *बुध* है । (सत्यार्थप्रकाश, प्रथम समुल्लास, महर्षि दयानन्द कृत)

कार्तिक अय्यर

अपने आपको मूलनिवासी कहने वाले लोग प्राय: ब्राह्मणों को कोसते मिलते हैं, विदेशी कहते हैं, गालियां बकते हैं। पर बुद्ध ने आर्य धर्म को महान कहा है । इसके विपरीत डॉ अंबेडकर आर्यों को विदेशी नहीं मानते थे। अपितु आर्यों होने की बात को छदम कल्पना मानते थे। महात्मा बुद्ध ब्राह्मण, धर्म, वेद, सत्य, अहिंसा , यज्ञ, यज्ञोपवीत आदि में पूर्ण विश्वास रखने वाले थे। महात्मा बुद्ध के उपदेशों का संग्रह धम्मपद के ब्राह्मण वग्गो 18 का में ऐसे अनेक प्रमाण मिलते है कि बुद्ध के ब्राह्मणों के प्रति क्या विचार थे।

१:-न ब्राह्नणस्स पहरेय्य नास्स मुञ्चेथ ब्राह्नणो।धी ब्राह्नणस्य हंतारं ततो धी यस्स मुञ्चति।।( ब्राह्मणवग्गो श्लोक ३)’ब्राह्नण पर वार नहीं करना चाहिये। और ब्राह्मण को प्रहारकर्ता पर कोप नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण पर प्रहार करने वाले पर धिक्कार है।’

२:- ब्राह्मण कौन है:-यस्स कायेन वाचाय मनसा नत्थि दुक्कतं।संबुतं तीहि ठानेहि तमहं ब्रूमि ब्राह्नणं।।( श्लोक ५)’जिसने काया,वाणी और मन से कोई दुष्कृत्य नहीं करता,जो तीनों कर्मपथों में सुरक्षित है उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं।

३:- अक्कोधनं वतवन्तं सीलवंतं अनुस्सदं।दंतं अंतिमसारीरं तमहं ब्रूमि ब्राह्नणं।।अकक्कसं विञ्ञापनिं गिरं उदीरये।याय नाभिसजे किंचि तमहं ब्रूमि ब्राह्नणं।।निधाय दंडभूतेसु तसेसु थावरेसु च।यो न हंति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्नणं।।( श्लोक ७-९)’जो क्रोधरहित,व्रती,शीलवान,वितृष्ण है और दांत है, जिसका यह देह अंतिम है;जिससे कोई न डरे इस तरह अकर्कश,सार्थक और सत्यवाणी बोलता हो;जो चर अचर सभी के प्रति दंड का त्याग करके न किसी को मारता है न मारने की प्रेरणा करता है- उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूं।।’

४:- गुण कर्म स्वभाव की वर्णव्यवस्था:-न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो।यम्हि सच्च च धम्मो च से सुची सो च ब्राह्मणो।।( श्लोक ११)’ न जन्म कारण है न गोत्र कारण है, न जटाधारण से कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य है, जो पवित्र है वही ब्राह्मण होता है।।

५:- आर्य धर्म के प्रति विचार:-धम्मपद, अध्याय ३ सत्संगति प्रकरण :प्राग संज्ञा:-साहु दस्सवमरियानं सन् निवासो सदा सुखो।( श्लोक ५)”आर्यों का दर्शन सदा हितकर और सुखदायी है।

धीरं च पञ्ञं च बहुस्सुतं च धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं।तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भजेथ नक्खत्तपथं व चंदिमा।।( श्लोक ७)” जैसे चंद्रमा नक्षत्र पथ का अनुसरण करता है, वैसे ही सत्पुरुष का जो धीर,प्राज्ञ,बहुश्रुत,नेतृत्वशील,व्रती आर्य तथा बुद्धिमान है- का अनुसरण करें।।

“”तादिसं पंडितं भजे”- श्लोक ८वाक्ताड़न करने वाले पंडित की उपासना भी सदा कल्याण करने वाली है।।”एते तयो कम्मपथे विसोधये आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं” ( धम्मपद ११ प्रज्ञायोग श्लोक ५) ”

तीन कर्मपथों की शुद्धि करके ऋषियों के कहे मार्ग का अनुसरण करे”धम्मपद पंडित प्रकरण १५/ में ७७ पंडित लक्षणम् में श्लोक १:- “अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पंडितो।।” सज्जन लोग आर्योपदिष्ट धर्म में रत रहते हैं।”परिणाम:- भगवान महात्मा गौतम बुद्ध ने ब्राह्मणों की इतनी स्तुति की है तथा आर्य वैदिक धर्म का खुले रूप से गुणगान किया है। इसलिये बुद्ध के कहे अनुसार भीमसैनिक को भी ब्राह्मणों और आर्यों का सम्मान करना चाहिये। दूसरों के बहकना नहीं चाहिए।सलंग्न चित्र- महात्मा बुद्ध यज्ञोपवीत धारण किये हुए।

कुछ बातों का चिंतन

मैं मानता हूं कि कुछ कालखंड में छुआछूत ऊंच-नीच और बहुत सारी कुप्रथा है जो समाज को दूषित किया है और यह जरूरी नहीं है कि वह प्रथा आज भी चल ही रही है अपवाद को छोड़ दे तो कोई व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता है यदि वह समाज में विद्या पढ़ाने पढ़ाने लिखाने का कार्य करता है तो वह ब्राह्मण है यदि वह देश की रक्षा करता है तो वह छत्रिय है यदि वह व्यापार इत्यादि चलाता है तो वह वैश्य है और यदि वह सेवा सहयोग स्वच्छता का कार्य करता है तो वह शूद्र है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में शूद्र को एक गाली के रूप में परिभाषित किया गया है और एक बहुत बड़े वर्गों को भ्रमित किया जा रहा है। महत्वपूर्ण क्या है कि ब्राह्मण शब्द की परिभाषा है जब तक परिभाषा समझ में नहीं आएगा तो उसका असली अर्थ समझ में नहीं आएगा कुछ लोग ब्राह्मण का जैसा अर्थ लिख दिए उसी को पढ़कर मान लेते हैं और एक समाज में आपस में ही एक दूसरे के विरोधी बनते जा रहे हैं ।

कुछ लोग ऐसे लेखकों के पुस्तकों से तर्क हीन गंदगी को ढूंढ ढूंढ कर समाज में प्रचार प्रसार करते रहते हैं और समाज में भ्रम फैला रहे हैं। और बोलते हैं कि तुम्हारे ग्रंथों में यह लिखा है। किसी पुस्तक में कुछ लिखा है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विचार होता है और उसमें कमी हो सकती है दूसरी बात ध्यान देने वाली बात है कि उस पुस्तक के लेखक कौन है क्योंकि किसी की संस्कृति को खराब करना है तो उनके आस्था रखने वाले ग्रंथों में छेड़छाड़ कर दो ताकि लोग की आस्था खत्म हो जाए।

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