अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

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अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी
बन जाए आत्मा भक्ति रस से
करे तेरी स्तुति
तुझे पाने के उद्देश्य से
प्रभु सत्य कर्म करें
हरदम भगवन् कीर्तन कर सकें
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

अब हमारे श्वास-श्वास मनके हैं मन के
मनोमय विज्ञानमय बने कोष प्रपन्न
कृपा हुई अनुभूत तेरी
हुआ तुझमें आसन्न
पाया आत्म प्रसाद तुझसे
हुआ प्रेम-प्रगम
आनन्दमय कोष तक
पहुँचा दिया तुमने भगवन्
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

अब तुम्हारी कृपा दे रही जीवन प्रतिक्षण
आ रहा है अब तेरी
स्तुतियों में भी आनन्द
इन्द्रियाँ ऋषि बन गई हैं
पल्लवित अङ्ग-अङ्ग
कर रही है साक्षात्कार
जागा प्रेम-प्रसङ्ग
वाणीरूप बना हर इक अङ्ग
गाते गीत भजन
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

वास्तविक रस पा लिया
सार्थक हुआ जीवन
सप्त ऋषियों को दिया
प्रभु ने ही पूर्णानन्द
तेरी संजीवनी से पाया
सच्चा संजीवन
आत्मदर्शी मेरी इन्द्रियाँ
हो गईं पावन
अब वो हैं परमात्मदर्शी
जिसमें परमानन्द
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी

मस्त होके इन्द्रियाँ
हो गईं हैं गानमय
मूक वाणी में जगा
प्रभु तेरा प्रेम-प्रणय
जड़ परमाणु पिण्ड भी
हो गए चेतन
आचरण करके अलौकिक
हो गए प्रतिपन्न
हो गया है यह जीवन
लम्बी सन्ध्या का कीर्तन
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी
बन जाए आत्मा भक्ति रस से
करे तेरी स्तुति
तुझे पाने के उद्देश्य से
प्रभु सत्य कर्म करें
हरदम भगवन् कीर्तन कर सकें
अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी