आत्म कृषक है सबल
आत्म कृषक है सबल,
यम-नियमों का है हल।
इन्द्रियां वृषभ हैं सुशक्त,
मन है भूमि उजल ।। १ ।।
प्राण-अपान है ओष समीर,
ब्रह्म गुण हैं सुबादल।
सद्गुण हरित सस्य श्यामल,
आनन्द लहलहाती फसल ।। २ ।।
आत्म कृषक है सबल
आत्म कृषक है सबल,
यम-नियमों का है हल।
इन्द्रियां वृषभ हैं सुशक्त,
मन है भूमि उजल ।। १ ।।
प्राण-अपान है ओष समीर,
ब्रह्म गुण हैं सुबादल।
सद्गुण हरित सस्य श्यामल,
आनन्द लहलहाती फसल ।। २ ।।
जिसने सच जीवन में उतारा जितना ।
यज्ञशिष्ट भोजी,ब्रह्मानन्द भोगी।
सुमेधा जीवन में धार के
भगवान आर्य जाति को प्रमाद ना हो जाये
ओ३म् की ध्वज के तले ।
नर तन को पा करके
महर्षि के बताये हुये मार्ग पर सारा संसार
आदि में थी श्रद्धा जिसके अन्त में आनन्द था।
प्रभु भक्ति में चूर रहते हैं
मैं अब बन्धन सह न सकूँगा।।
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