आइये मोहन पुनः
आइये मोहन पुनः ब्रज को बचाने के लिए।
तेरे पुजारी जा रहे इसको मिटाने के लिए।।
आकर जरा तो देख तेरे भक्त जन क्या कर रहे।
कर्म कुछ और जाप कुछ जग को दिखाने के लिए ।। 1 ।।
पीत पट कछनी नहीं है अब तुम्हारी सी यहाँ।
पतलून पाजामा है टाई गले लगाने के लिए।।2।।
दूध दधि माखन तो यों ही ब्रज में था बहता रहा।
आज बस एक चाय है पीने पिलाने के लिए ।।3।।
मिश्री व मक्खन प्रेम से खाते थे सब ब्रज जन यहाँ।
अब दे लो मुर्गी व बकरे, मछली खाने के लिए।।4।।
आपकी जन्मभूमि में अब स्वांग भरकर नाचते।
राधा बनाकर भीख मँगवाते लजाने के लिए ।।
पढ़ते थे पुस्तक धार्मिक जब वेद का प्रचार था।
अब रह गये उपन्यास, नाविल दिल लगाने के लिए ।।6।।
गीता के उपदेश पर ध्यान देते हैं नहीं।
स्वांग फिल्मी गीत रसिया हैं सुनाने के लिए ।।7।।
‘सेवा करी गौ मात की पाली रहे घनश्याम खुद ।
यहाँ मुर्गियों के खिरक हैं दाना चुगाने के लिए।।8।।
























